<?xml version='1.0' encoding='UTF-8'?><?xml-stylesheet href="http://www.blogger.com/styles/atom.css" type="text/css"?><feed xmlns='http://www.w3.org/2005/Atom' xmlns:openSearch='http://a9.com/-/spec/opensearchrss/1.0/' xmlns:georss='http://www.georss.org/georss' xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'><id>tag:blogger.com,1999:blog-7953000159750832439</id><updated>2011-11-28T06:05:43.909+05:30</updated><title type='text'>मन</title><subtitle type='html'>वो कमरा जिसका दरवाज़ा बमुश्किल मिलता है, जो खचाखच भरा है और जिसे बीच बीच में खाली करना बेहद जरुरी है...</subtitle><link rel='http://schemas.google.com/g/2005#feed' type='application/atom+xml' href='http://sinhasushant.blogspot.com/feeds/posts/default'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7953000159750832439/posts/default?max-results=100'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sinhasushant.blogspot.com/'/><link rel='hub' href='http://pubsubhubbub.appspot.com/'/><author><name>Sushant Sinha</name><uri>http://www.blogger.com/profile/15423665229773619092</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><generator version='7.00' uri='http://www.blogger.com'>Blogger</generator><openSearch:totalResults>21</openSearch:totalResults><openSearch:startIndex>1</openSearch:startIndex><openSearch:itemsPerPage>100</openSearch:itemsPerPage><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7953000159750832439.post-6971828886881557518</id><published>2011-10-15T07:30:00.002+05:30</published><updated>2011-10-15T08:23:38.324+05:30</updated><title type='text'>Breaking News-- रामलीला Live</title><content type='html'>पिछले कई दिनों से एक ख्याल रामलीला को लेकर मन में था पर वक्त हीं नही मिल पा रहा था कि लिखूं... दरअसल हिन्दी मीडिया में काम करते कई साल हो गए औऱ महसूस किया है कि कुछ खबरें तो ऐसी हैं जो साल दर साल, बार-बार चलती हैं और उनमें कुछ भी नया नहीं होता... पर दिखाना है तो दिखाना है... उन्हीं में से एक है 'रामलीला'..&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जिस वक्त रावण का वध हुआ होगा, राम जी ने खुद नहीं सोचा होगा कि एक समय ऐसा भी आएगा जब रावण के मरने की खबर ब्रेकिंग न्यूज में चला करेगी... लेकिन टीवी चैनल्स की महिमा ही है कि अब उधर ऱावण की तरफ तीर बढ ही रहा होता है कि उससे पहले हीं, पहले से तैयार किया गया ब्रेकिंग न्यूज का चस्पा स्क्रीन पर चिपक जाता है... Breaking News-- दिल्ली के रामलीला मैदान में रावण जला... कुंभकरण भी 'धूं-धूं' कर जला.... &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;खैर, इस साल भी कमोबेश यही हाल था... हर चैनल रावण को सबसे पहले मरते हुए दिखाने का दावा कर रहा था... रावण को मरते हुए लाइव दिखाने का दंभ भर रहा था... कि अचानक एक ख्याल मन में कौंधा... कि अगर राम और रावण वाकई आज के युग में होते और राम ने रावण का दहन कर दिया होता तो उसकी ब्रेकिंग कैसे चलती... खासतौर पर तब जब राम और रावण दोनों हीं आज के युग के 'आम आदमी' होते....&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सबसे पहले न्यूज चैनल की असाइनमेन्ट डेस्क (न्यूज चैनल्स की वो जगह जहां खबरें आकर सबसे पहले गिरती हैं) पर फोन घनघनाता... &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;असाइनमेन्ट डेस्क का बंदा- हैलो, कौन?&lt;br /&gt;रिपोर्टर- मनोज बोल रहा हूं सर...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;असाइनमेन्ट डेस्क का बंदा- अरे मनोज, का रे... तुम तो बिरयानी खिलाने वाले थे... गायबे हो गए...&lt;br /&gt;रिपोर्टर- का करें भाई, कामे इतना है... खैर, सुनिए तो... एक ब्रेकिंग चलवा दिजिए...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;असाइनमेन्ट डेस्क का बंदा- का हुआ...&lt;br /&gt;रिपोर्टर- अरे, दिल्ली में रामलीला मैदान के पास एक आदमी तीन लोगों को जिन्दा जला दीहिस है...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;असाइनमेन्ट डेस्क का बंदा- का बात कर रहे हो... तीनों एक्के फैमिली के थे?&lt;br /&gt;रिपोर्टर- हां&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;असाइनमेन्ट डेस्क का बंदा- और बताओ खबर... एक लाइन का ब्रेकिंग थोडे हीं चलेगा...&lt;br /&gt;रिपोर्टर--- अरे, जो जलाइस है उसका नाम राम है... और तीन गो भाई था... रावण, कुंभकरण और मेघनाद... तीनों को जला दिया है... जिन्दा... लड़की का मामला है... इ रावण जो है, राम की बीवी को भगा ले गया था... उसी का कुछ पंगा था... सो साला, गुस्से में आज तीनों को जला दीहिस है...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;असाइनमेन्ट डेस्क का बंदा- साला... इ तो बड़ी खबर है... विजुअल बना लिए हो...&lt;br /&gt;रिपोर्टर- अरे, झमाझम विजुअल है... एक दम लाइव.... तीनों का जलते हुए...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;असाइनमेन्ट डेस्क का बंदा- चलों ब्रेकिंग चलवा रहे हैं... बाकि फोनो पर बताना....&lt;br /&gt;रिपोर्टर- ओके...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;असाइनमेन्ट डेस्क का बंदा- आउटपुट... आउटपुट... (आउटपुट न्यूज चैनल का वो हिस्सा है जिसके पास आयी हुई खबर का बलात्कार करने या सत्कार करने का फैसला लेने का अधिकार होता है..)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;असाइनमेन्ट डेस्क का बंदा- आउटपुट ध्यान दिजिए... ब्रेकिंग है... दिल्ली के रामलीला मैदान के पास एक शख्स ने तीन लोगों को जिन्दा जला दिया है... जलने वाले तीनों भाई थे... लड़की का मामला है... जलाने वाले का नाम राम है... जो जले हैं वो रावण, कुंभकरण औऱ मेघनाद हैं... राम की बीवी को रावण भगा ले गया था... उसी से गुस्सा राम ने तीनों को जला दिया है... जल्दी चला लिजिए... अभी तक किसी चैनल के पास खबर नहीं है... विजुअल की आई डी भई बस फ्लैश कर रहे हैं....&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;खबरों के अकाल में घिसी पिटी खबरें चला रहे आउटपुट के लिए ये खबर संजीवनी से कम नहीं होगी... तुरंत हरकत में आएंगे सारे महानुभाव बॉसेस...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पहला बॉस-- आउटपुट... खबर तोड़ दिजिए... &lt;br /&gt;आउटपुट-- सर राखी सावंत का शो का रिपीट चल रहा है...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बॉस- अरे बाप रे... कोई नहीं, विजुअल अच्छा है तो थोडी देर ले लो...&lt;br /&gt;आउटपुट-- विजुअल तो झमाझम है... जलाते हुए लाइव विजुअल हैं...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बॉस-- बहुत बढिया... ले लो तुरंत... और सुनो... वर्चुअल सेट बनवा लो... औऱ एक बग के लिए भी बोल दो...&lt;br /&gt;आउटपुट-- जी सर...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;          थोड़ी ही देर में टीवी स्क्रीन पर खबर इतने बड़े-बडे औऱ मोटे-मोटे अक्षरों में फ्लैश होगी कि अंधा भी पढ ले... औऱ फिर एंकर चीख-चीखकर बताएगा कि कैसे दुनिया का सबसे बड़ा पाप हो गया है...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एंकर-- इस वक्त की बड़ी खबर हम आपको बता दें जो आ रही है दिल्ली के रामलीला मैदान से... जहां एक निर्दयी शख्स ने तीन तीन लोगों को जिन्दा जला दिया है... इस शख्स का नाम राम बताया जा रहा है... खबर के मुताबिक राम की बीवी सीता को रावण नाम का शख्स भगा ले गया था...राम ने कई बार पुलिस में शिकायत भी दर्ज करायी लेकिन नतीजा सिफर हीं रहा...औऱ इसी वजह से गुस्से में राम नाम के इस शख्स ने तीन भाईयों, रावण, कुंभकरण औऱ मेघनाद को जला दिया है... इस वक्त हमारे संवाददाता मनोज हमारे साथ जुड रहे हैं ज्यादा जानकारी के साथ...मनोज...मनोज... सबसे पहले तो हमारे दर्शकों को ये बताईए कि हुआ क्या है....&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;  बेचारा मनोज भी अब वही सारी बातें जो महज कुछ सेकेंड पहले एंकर ने कहीं थी, बताएगा...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एंकर-- मनोज ये बताइए कि इन तीनों की हालत कितनी गंभीर है...&lt;br /&gt;मनोज(रिपोर्टर)- जी.. हम आपको बता दें कि तीनो बुरी तरह से जल गए हैं... कुंभकरण ने तो मौके पर हीं दम तोड़ दिया था लेकिन रावण औऱ मेघनाद को दिल्ली के राम मनोहर लोहिया अस्पताल में भर्ती कराया गया है... जहां डॉक्टर्स ने दोनों को 95 फीसदी से ज्यादा जला हुआ बताया है...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एंकर-- और मनोज, राम नाम के जिस शख्स ने इस कुकृत्य को अंजाम दिया है वो कहां है...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मनोज(रिपोर्टर)-- जी, हम आपको बता दें कि राम को इस वक्त पुलिस ले गयी है जिससे पूछताछ की जा रही है... दरअसल राम पिछले कई दिनों से परेशान चल रहा था.... उसके पिता ने उसे फैमिली बिजनेस से बेदखल कर दिया था..  उसने अपना बिजनेस शुरु करने की कोशिश की पर वो चल नहीं पाया... अपने भाई लक्ष्मण औऱ बीवी सीता के साथ वो दिल्ली के त्रिलोकपुरी इलाके में एक छोटे से घर में किसी तरह से गुजारा कर रहा था... इसी दौरान, माइनिंग का बिजनेस करने वाले रावण की नजर सीता पर पड़ी... औऱ एक दिन वो उसे भगा ले गया... औऱ...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एंकर-- मनोज, हम आपको थोडी देर के लिए रोक रहे हैं...हम दर्शकों को वो तस्वीरें दिखा दें जो मानवता के नाम पर धब्बा हैं... हम आपको ये भी बता दें कि आप ये 'एक्सक्लूसिव' तस्वीरें सबसे पहले xyz चैनल पर देख रहे हैं... ये घटना की तस्वीरें हैं... आप खुद देखिए कि कैसे राम नाम के इस शख्स ने इन तीन भाईयों को जिन्दा जला डाला...एक ऐसी खबर जो हर आंख में आंसू ले आएगी... राम नाम का ये शख्स इंसानियत के नाम पर धब्बा है... हालांकि इसके भी दर्द को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता, जिस तरह से इसकी बीवी को भगा ले गया था रावण औऱ पुलिस से भी उसे कोई मदद नहीं मिली... लेकिन फिर भी... फिर भी जो राम ने किया उसे कतई सही नहीं ठहराया जा सकता... इन तस्वीरों में राम की हैवानियत साफ झलक रही है... बदले की आग में जल रहे राम ने रावण और उसके भाईयों को जिन्दा जला डाला... गौर से देखिए इन तस्वीरों को.. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;         इस बीच कार्यक्रम को लंबा खींचने के लिए फोनो लिए जाएंगे और फोन लाइन्स आम लोगों के लिए भी खोल दी जाएंगी...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एंकर-- हम आप दर्शकों से भी चाहेंगे कि दिल्ली की इस दिल दहला देने वाली वारदात पर अगर आप कुछ कहना चाहें तो हमें फोन कर सकते हैं.... &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एंकर-- औऱ इस वक्त हमारे साथ जुड गए हैं इलाके के डीसीपी अजीत पांडे जी... जी सर, बताएं... कैसे अंजाम दिया इस शख्स ने इस घटना को...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;डीसीपी साहब-- देखिए, अभी इस शख्स से पूछताछ चल रही है... इसके कुछ साथियों की भी तलाश की जा रही है... एक तो इसका भाई है लक्ष्मण औऱ दूसरा इसका साथी है हनुमान सिंह... उन दोनों को भी हम ढूंढ रहें हैं... दोनों की भी मामले में संलिप्तता के सुराग मिले हैं... हनुमान सिंह तो पहले भी रावण को एक दो बार धमकी देकर आ चुका था ऐसी खबरें भी मिल रही हैं.... जैसे जैसे जानकारी मिलेगी हम आपको बताएंगे....&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एंकर-- बहुंत शुक्रिया सर आपका... जैसा कि आपने सुना, डीसीपी अजीत पांडे जी ने खुद बताया कि पूरे मामले में राम अकेला नहीं था, उसके साथ उसका भाई लक्ष्मण औऱ साथी हनुमान सिंह भी थे... यानि पूरी सोची समझी साजिश के तहत इस घटना को अंजाम दिया गया है... इस बीच हमारे संवाददाता मनोज भी हमारे साथ बने हुए हैं.... जी मनोज, ये बताएं कि सीता, जिसकी वजह से ये सबकुछ हुआ वो कहां है&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मनोज(रिपोर्टर)-- जी, हम आपको बता दें कि सीता नाम कि ये महिला एक हाउस वाइफ है... इसके पिता का भी अच्छा खासा कारोबार है लेकिन राम से शादी के बाद से हीं इसके बुरे दिन चल रहे थे... फिलहाल ये महिला थाने में हीं है अपने पति राम के पास....&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एंकर-- जी मनोज... हम आपको रोक रहे हैं... इस वक्त दिल्ली से मीना जी हमारी एक दर्शक हमारे साथ फोन लाइन पर जुड़ गयी हैं... जी मीना जी, क्या कहना चाहेंगी आप...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मीना जी(दर्शक)-- हमें तो लगता है कि राम को भी जिन्दा जला देना चाहिए... बताओ भईया... ये कोई तरीका हुआ... तीन-तीन लोगों को बीच चौराहे जिन्दा जला दिया...सबके सामने... ऐसे आदमी को तो फांसी देनी चाहिए... &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एंकर-- जी मीना जी, बहुत बहुत शुक्रिया आपका... अपनी राय हमारे साथ बांटने के लिए... और फिलहाल हम रुक रहे हैं एक छोटे से ब्रेक के लिए लेकिन ब्रेक के बाद भी हम इस बड़ी खबर पर बने हुए हैं....&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;और ब्रेक के बाद भी फोन, राम के घर के विजुअल, उसके परिवार का पूरा बॉयोडाटा, रावण के परिवार के पुराने विजुअल, अलग अलग शहर के लोगों की प्रतिक्रिया और ना जाने क्या क्या... सबकुछ मिला कर ये कि पूरे दिन का मसाला...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;               इतना सब दिमाग में आने के बाद लगा कि शुक्र है कि जब राम जी ने रावण वध किया उस वक्त न्यूज चैनल्स नहीं थे वरना वो भी हे राम..हे राम कहते हुए सीता जी के साथ हीं धरती में समा जाते....&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7953000159750832439-6971828886881557518?l=sinhasushant.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sinhasushant.blogspot.com/feeds/6971828886881557518/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://sinhasushant.blogspot.com/2011/10/breaking-news-live.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7953000159750832439/posts/default/6971828886881557518'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7953000159750832439/posts/default/6971828886881557518'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sinhasushant.blogspot.com/2011/10/breaking-news-live.html' title='Breaking News-- रामलीला Live'/><author><name>Sushant Sinha</name><uri>http://www.blogger.com/profile/15423665229773619092</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7953000159750832439.post-5839459066931409877</id><published>2010-10-27T20:49:00.004+05:30</published><updated>2010-10-27T22:24:33.256+05:30</updated><title type='text'>बरगद का 'वो' पेड़...</title><content type='html'>किसी बेहद करीबी ने हाल में हीं अपनी रचना के ज़रिए समझाया कि हर रिश्ता नाज़ुक फूल की तरह है... रचना में लिखा था कि अगर प्यार ना मिले तो फूल मुरझा जाता है... बात उम्दा लगी... समझ में भी आयी... लेकिन कुछ सवाल छोड़ गयी अंदर... मसलन, क्या फूल के मुरझाने का दर्द सबसे ज्यादा उस फूल को होता होगा या उस माली को जिसने न जाने कितने जतन से उस फूल को बीज से फूल तक का सफर तय करते देखा है... क्या माली का भी अपना दर्द होता होगा जिससे उसने फूल को हमेशा दूर रखा होगा... क्या माली भी कभी फूल से कुछ चाहता होगा... कुछ ऐसे हीं सवाल... लेकिन जो बात कही गयी थी वो पते की लगी तो ज़हन में उतार ली...लगा, जैसे एक फूल कितना कुछ कह सकता है...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फिर, एक दिन दफ्तर में ना जाने कितने सालों से चट्टान की तरह खड़ा रहने वाला बरगद का पेड़ धराशायी हो गया... पेड़ इतना बड़ा था कि गिरा तो यकीन नहीं हुआ कि एक आंधी की मार ने उसे हिलाया हो... पर चर्चा इसी बात की हो रही थी तो सबने मान लिया कि आंधी की ताकत उस एक वक्त पर ज्यादा रही होगी... मेरा मन नहीं माना... आते-जाते, गुज़रते हमेशा उस पेड़ को देखा करता... हर शाम सुनायी देने वाली , न जाने दिनभर का कौन सा काम निपटाने के बाद लौटने वाली सैंकड़ों चिड़ियों की चहचहाहट अनायास याद आ जाती... क्योंकि मैं भी अमूमन उसी वक्त टहल टहल कर फोन पर बात करता और शायद मेरी बातचीत वो सुनते और उनकी मैं... मैं कई बार डिकोडिंग करने की कोशिश भी करता कि क्या कोइ चिड़िया अपने दिन भर का दर्द बता रही होगी किसी दोस्त को, तो कोइ नन्ही चिड़िया मां से खाना मांग रही होगी, तो किसी पति-पत्नि में झगड़ा हो रहा होगा कि आने में इतनी देर क्यों हुई... वगैरह-वगैरह....&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पर सवाल ये था कि इतना मज़बूत दिखने वाला बरगद का 'वो' पेड़ गिर कैसे गया... और जवाब भी जल्द हीं मिल गया... &lt;br /&gt;एक दिन पेड़ के जड़ के हिस्से को देखा तो दिखा कि पेड़ तो अन्दर हीं अन्दर बिलकुल खोखला हो चुका था... जड़ें हिल चुकी थीं... बाहर से मज़बूती की मिसाल दिखने वाला 'वो' पेड़, अंदर से कमज़ोरी की दास्तान बयां कर रहा था...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;और फिर एक ख्याल आया... कितने हीं ऐसे लोग हैं जो बाहर से यूं ही मज़बूत नज़र आते हैं... हर वक्त लोगों के चेहरे पर मुस्कान लाने वाले और उनमें ऊर्जा भरने वाले 'वो' लोग जो कब अंदर हीं अंदर खोखले होते जाते हैं, किसी को पता नहीं चलता... खुद के खोखलेपन से दूर रखकर कभी छांव, तो कभी पनाह देने वाले उस बरगद के पेड़ का दर्द भी शायद यही था कि उसके अंदर कोई झांक नहीं पाया... लोगों की उसकी छांव दिखती, उसकी खूबसूरत हरी पत्तियां दिखतीं, उसपर गुलज़ार घरौंदे दिखते, उसकी भव्यता दिखती लेकिन अंदर हीं अंदर उसे क्या खाए जा रहा था... किसी को ना दिखता...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक दिन बरगद का 'वो' पेड़ गिर गया... और अब 'वो' कभी नहीं उठेगा... पर सवाल रह रह कर मन में उठ रहा है...&lt;br /&gt;    फूल का मुरझाना तो दिख जाता है पर बरगद के उस पेड़ का अंदर हीं अंदर खोखला हो जाना क्यों नहीं दिख पाता... ???&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7953000159750832439-5839459066931409877?l=sinhasushant.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sinhasushant.blogspot.com/feeds/5839459066931409877/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://sinhasushant.blogspot.com/2010/10/blog-post_27.html#comment-form' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7953000159750832439/posts/default/5839459066931409877'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7953000159750832439/posts/default/5839459066931409877'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sinhasushant.blogspot.com/2010/10/blog-post_27.html' title='बरगद का &apos;वो&apos; पेड़...'/><author><name>Sushant Sinha</name><uri>http://www.blogger.com/profile/15423665229773619092</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7953000159750832439.post-4186760805028069601</id><published>2010-10-23T23:42:00.001+05:30</published><updated>2010-10-23T23:42:29.135+05:30</updated><title type='text'>आखिर क्यों....</title><content type='html'>(आजकल बहुत से लोग, जो मुझे अरसे से जानते हैं, कहते हैं मैं बहुत बदल गया हूं... बहुत चुप हो गया हूं... बोलता नहीं... जब लिखने बैठा था तो लगा था कि बहुत कुछ कह पाउंगा लेकिन यहां भी शब्दों के जरिए भी बहुत कम हीं कह पाया... न जाने क्या हुआ और बस आधा-अधूरा लिखकर खत्म कर दिया... यहां भी बोल नहीं पाया... :-(   &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पूरे चांद की रात है,&lt;br /&gt;सन्नाटे का साथ है...&lt;br /&gt;घर की मुंडेर पर खड़ा ताक रहा हूं&lt;br /&gt;शायद खुद में हीं झांक रहा हूं...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गुलाबी ठंड लिए हवा अभी बगल से गुज़री है&lt;br /&gt;पर मन तो न जाने कब से जमा है&lt;br /&gt;सब चल रहे हैं, बढ़ रहे हैं&lt;br /&gt;पर मेरा तो हर हिस्सा जैसे वहीं थमा है...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जीवन के अनुभवों से छलनी अंतर्मन से&lt;br /&gt;मानों सवाल रिस रहे हैं&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सवाल, जो पूछते हैं&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सबकुछ यूं हीं कब तक चलेगा&lt;br /&gt;मुझको जो पढ़ ले, ऐसे किसी का ना होना कब तक खलेगा&lt;br /&gt;हर लम्हा दूसरों के मुताबिक क्यों ढ़लेगा&lt;br /&gt;जो हर पल जिए मुझे, वो कब मिलेगा........&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;और भी न जाने कितने सवाल&lt;br /&gt;जवाबों के सूखे ने &lt;br /&gt;जीने की लालसा को बंजर बना डाला है&lt;br /&gt;औऱ अब तो सिर्फ यही पूछता हूं&lt;br /&gt;क्यों... आखिर क्यों....&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7953000159750832439-4186760805028069601?l=sinhasushant.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sinhasushant.blogspot.com/feeds/4186760805028069601/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://sinhasushant.blogspot.com/2010/10/blog-post.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7953000159750832439/posts/default/4186760805028069601'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7953000159750832439/posts/default/4186760805028069601'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sinhasushant.blogspot.com/2010/10/blog-post.html' title='आखिर क्यों....'/><author><name>Sushant Sinha</name><uri>http://www.blogger.com/profile/15423665229773619092</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7953000159750832439.post-3768894874222925187</id><published>2010-04-18T19:42:00.004+05:30</published><updated>2010-05-11T10:32:03.945+05:30</updated><title type='text'>आखिरी बार कब......?</title><content type='html'>मेरा सवाल थोड़ा अजीब जरुर लगे पर मैं यही पूछना चाहता हूं कि,आखिरी बार कब नहाए थे आप... ???&lt;br /&gt;मुझे यकीन है कि जवाब आज, अभी या दिन में कई बार हीं होगा आपमें से ज्यादातर लोगों का और इतनी गर्मी में भी अगर कोई ऐसा है जो जवाब कल,परसों या कुछ दिन पहले... के तौर पर दे सकता है तो वो चरणस्पर्श योग्य है...(इतनी गर्मी में पसीने से नहाने के बाद भी पानी से नहाने का मन ना करे जिसका उसके पैर तो छू हीं लेने चाहिए... बिरले मिलते हैं ऐसे महापुरुष जो दुनिया के लिए पानी बचाने के लिए कुछ भी सह जाते हैं...)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;खैर, अब मैं सवाल फिर पूछता हूं लेकिन थोड़ा बदलकर... सवाल वही है, कि आप आखिरी बार कब नहाए थे... ??? वो कौन सा दिन था जब आप नहाते वक्त सिर पर पड़ी पानी की पहली बूंद को महसूस कर पाए थे... ??? वो कौन सा दिन था जब नहाते वक्त पानी और शरीर के दूसरे अंगों का आपसी आलिंगन महसूस किया था... ??? वो कौन सा दिन था जब पानी की ठंडक या गर्माहट को रुह तक का रास्ता तय करते देखा था... ??? &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हो सकता है कईयों को याद ना हो क्योंकि ये एक बड़ा सच है... जब हम नहा भी रहे होते हैं तो कुछ न कुछ सोच रहे होते हैं... पानी,सिर पर गिरकर बदन पर से होता हुआ कब नाली में चला जाता है, पता तक नहीं चलता... क्योंकि शरीर तो नहा रहा होता है लेकिन मन ख्यालों के रेगिस्तान में भटक रहा होता है...&lt;br /&gt;और ये बात सिर्फ नहाने के लिए लागू नहीं होती... आप खुद से सवाल पूछ सकते हैं कि आखिरी बार कब खाए थे... ? या यूं कहिए कि आखिरी बार कब खाने के हर निवाले को महसूस किया था.... ???&lt;br /&gt;आखिरी बार ड्राइविंग कब की थी... ??? आखिरी बार बात-चीत कब की थी, क्योंकि बात-चीत के दौरान भी वहां न होना बहुत आम हैं... कमी वक्त की नहीं है... फितरत बन गयी है ये हम सब की...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शरीर कहीं, मन कहीं... लेकिन आज हीं एक दोस्त ने अपने पिताजी की बात समझाई कि इंसान की सबसे बड़ी लड़ाई खुद से है,किसी और से नहीं... दरअसल हम इस दुनिया में दूसरों को खुद के मुताबिक देखना चाहते हैं... दूसरों के जीवन पर पूर्ण अधिकार चाहते हैं लेकिन खुद पर हमारा वश नहीं है... हम खुद पर हीं जीत हासिल नहीं कर पाते... मन का भटकाव भी इसी की वजह से है क्योंकि जो हम चाहते हैं उसका आवेग इतना है कि मन पर के नियंत्रण को ध्वस्त कर देता है... और इसीलिए जरुरत है मन को जीतने की... &lt;br /&gt;बहुत मुश्किल है... बहुत हीं ज्यादा मुश्किल... लेकिन जो जीत गया... वो फिर जिन्दगी में कभी नहीं हारता... हम मन से नहीं हैं बल्कि मन हमसे है... लेकिन वास्तविक्ता बिलकुल उलट है इससे... और इसीलिए ज्यादातर वक्त हम खुद के साथ हीं नहीं होते... कई बार जिस समस्या को, सोचने का 10 फीसदी हिस्सा देना है उसे 90 फीसदी का अधिकार देकर न सिर्फ उस समस्या को बड़ा बनाते हैं बल्कि बाकि उलझनों को छोटा कर उनके परिणामों को भी बड़ा कर देते हैं...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसलिए जरुरी है कि मन पर काबू पाया जाए... औऱ इसके लिए जरुरी है कि सच को नज़रअंदाज़ ना करें... कहते हैं झूठ के पांव नहीं होते और इसीलिए वो ज्यादा दूर चल नहीं पाता लेकिन सच हमेशा साथ निभाता है... मन की फितरत की वजह से कई बार हम सच को देख रहे होते हैं लेकिन दूसरी तरफ वो भी नज़र आता है जो क्षणिक है, आकर्षक है और मन का है और शायद बाद में तकलीफ देने वाला भी... पर हम सच को कोने की नज़र से देखते हुए भी उस तरफ बढ़ जाते हैं जिधर मन ले जाता है और वहीं से परेशानियों का रास्ता शुरु होता है...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मन की सुनिए लेकिन सत्य को अनदेखा भी न किजिए... मन काबू में होगा तो नहा भी पाएंगे, खा भी पाएंगे और खुद के साथ वक्त भी बिता पाएंगे... और हां, खुद को जीत भी पाएंगे...&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7953000159750832439-3768894874222925187?l=sinhasushant.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sinhasushant.blogspot.com/feeds/3768894874222925187/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://sinhasushant.blogspot.com/2010/04/blog-post_18.html#comment-form' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7953000159750832439/posts/default/3768894874222925187'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7953000159750832439/posts/default/3768894874222925187'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sinhasushant.blogspot.com/2010/04/blog-post_18.html' title='आखिरी बार कब......?'/><author><name>Sushant Sinha</name><uri>http://www.blogger.com/profile/15423665229773619092</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7953000159750832439.post-8612573634870566941</id><published>2010-04-08T09:30:00.004+05:30</published><updated>2010-04-08T09:54:38.983+05:30</updated><title type='text'>तुम...</title><content type='html'>तुम...&lt;br /&gt;मेरा प्यार ,&lt;br /&gt;मेरा उद्गगार,&lt;br /&gt;मेरा संघर्ष भी&lt;br /&gt;मेरा हर्ष भी&lt;br /&gt;मेरी कमी,&lt;br /&gt;मेरी संपूर्णता&lt;br /&gt;मेरी बुद्दिमानी&lt;br /&gt;मेरी मूर्खता&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तुम...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेरा हर पल&lt;br /&gt;मेरा कौतूहल&lt;br /&gt;मेरी बेचैनी&lt;br /&gt;मेरा करार&lt;br /&gt;मेरा किनारा&lt;br /&gt;मेरी मझदार&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तुम...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आंसूओं से भीगी पलक भी&lt;br /&gt;खुशी की झलक भी&lt;br /&gt;तुम विरह &lt;br /&gt;तुम मिलन भी&lt;br /&gt;तुम तन मेरा&lt;br /&gt;तुम मन भी&lt;br /&gt;बिन तुम&lt;br /&gt;सब गुमसुम&lt;br /&gt;कभी तुम कहीं नहीं&lt;br /&gt;और कभी हरकहीं&lt;br /&gt;जाने कैसे तुम्हे समझाउं&lt;br /&gt;तुम बिन&lt;br /&gt;मैं कुछ भी नहीं...&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7953000159750832439-8612573634870566941?l=sinhasushant.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sinhasushant.blogspot.com/feeds/8612573634870566941/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://sinhasushant.blogspot.com/2010/04/blog-post.html#comment-form' title='5 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7953000159750832439/posts/default/8612573634870566941'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7953000159750832439/posts/default/8612573634870566941'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sinhasushant.blogspot.com/2010/04/blog-post.html' title='तुम...'/><author><name>Sushant Sinha</name><uri>http://www.blogger.com/profile/15423665229773619092</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>5</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7953000159750832439.post-4359800503199293841</id><published>2010-02-24T18:53:00.002+05:30</published><updated>2010-02-24T19:08:32.337+05:30</updated><title type='text'>रिश्तों में 'एक्सपेक्टेशन' नहीं होनी चाहिए</title><content type='html'>('मन' के कोने में दबी ये भावनाएं दरअसल मेरी नहीं बल्कि मेरे दोस्त नीरज की हैं... पेशे से अपना बिज़नेस चला रहे नीरज बेहद सुलझे हुए वय्क्तित्व हैं... उन्होंने कुछ लिखा तो मुझे ये कहकर भेजा कि इसे अपने शब्दों में खूबसूरत बना कर अपने ब्लॉग पर डालना लेकिन उनकी भावनाएं उनके हीं शब्दों में शब्दश: डाली हैं... क्योंकि ब्लॉग का नाम हीं 'मन' है और मन की बातें खूबसूरत या बदसूरत नहीं होती... वो सिर्फ सच्ची होती हैं... इसीलिए इस लेख की सच्चाई को बरकरार रहने दिया है... उम्मीद है नीरज ऐसा हीं बेहतर लिखते रहेंगे... शुभकामनाएं... :-))&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जब आप किसी से अपना रिश्ता बनाते हैं तो उससे कोई एक्सपेक्टेशन या शर्त नहीं जुड़ी होती है... आप ये सोचकर किसी रिश्ते में नहीं जाते कि वो इंसान आपके लिए ऐसा करेगा या वैसा... आप उस रिश्ते में इसलिए जाते हैं क्योंकि वो आपको अच्छा लगता है... आप उसके साथ रहना चाहते हैं या वक्त बिताना चाहते हैं... पर समय के साथ जैसे जैसे आप उस इंसान के करीब आने लगते हैं आपके एक्सपेक्टेशन की लिस्ट लंबी होने लगती है... ऐसा क्यों होता है ??? &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आपने इस शर्त पर तो रिश्ता नहीं बनाया था... पर आप फिर भी चाहते हैं कि सामने वाला इंसान आपकी सारी इच्छाओं को पूरा करे... और जहां एक्सपेक्टेशन की बात आती है, रिश्ते कमज़ोर पड़ने लगते हैं... &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रिश्तों का अपना महत्व होता है... अगर आप किसी से प्यार करते हैं और उसके साथ रहना चाहते हैं तो उसे अपनी इच्छाओं में ना बांधें... इससे दूरियां बढ़ने लगती हैं... प्यार या रिश्ते शर्तों पर नहीं बनाये जा सकते... अगर आप सच्चे मायनों में रिश्तों को जीना चाहते हैं तो एक दूसरे का सहारा बनने की कोशिश किजिए... ना कि एक दूसरे को अपने मुताबिक बदलने की कोशिश करें... अगर आप बिना एक्सपेक्टेशन या शर्त के एक दूसरे का साथ देंगे तो आपको खुद महसूस होगा कि आपकी सारी एक्सपेक्टेशन पूरी हो रही है... और फिर हर रिश्ता आपको सुंदर लगेगा क्योंकि उसकी खूबसूरती बदलते वक्त के बावजूद कायम रहेगी...&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7953000159750832439-4359800503199293841?l=sinhasushant.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sinhasushant.blogspot.com/feeds/4359800503199293841/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://sinhasushant.blogspot.com/2010/02/blog-post_24.html#comment-form' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7953000159750832439/posts/default/4359800503199293841'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7953000159750832439/posts/default/4359800503199293841'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sinhasushant.blogspot.com/2010/02/blog-post_24.html' title='रिश्तों में &apos;एक्सपेक्टेशन&apos; नहीं होनी चाहिए'/><author><name>Sushant Sinha</name><uri>http://www.blogger.com/profile/15423665229773619092</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7953000159750832439.post-1805898800485455405</id><published>2010-02-20T09:02:00.002+05:30</published><updated>2010-02-20T09:27:32.213+05:30</updated><title type='text'>जीवन का 'निर्मल' सच-- अलविदा</title><content type='html'>4 फरवरी 2010--- जाने माने एक्टर निर्मल पांडे या जैसा कि मैं उन्हें बुलाता था, निर्मल दा, लाइव इंडिया के कैम्पस में मौजूद सिगरेट का कश लगा रहे थे... मैंने गाड़ी पार्किंग में खड़ी की और उनका गले लगाने का चिर परिचित अंदाज़ मानों मेरा इंतज़ार कर रहा था.... बातचीत हालचाल पूछने से शुरु हुई औऱ फिर उन्होंने ज़िक्र छेड़ा कि वो बहुत जल्द कुछ बहुत बड़ा करने जा रहे हैं.... दुआ सलाम के बाद हम दोनों अपने अपने काम में लग गए....&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;18 फरवरी 2010--- लाइव इंडिया का मेकअप रुम... मैं मेकअप ले रहा था तभी साथ कि कुर्सी पर बैठी एक रिपोर्टर के पास किसी का फोन आया... उसका चौंकने वाले अंदाज़ में कहना कि 'क्या निर्मल पांडे मर गए'... मुझे भी चौंका गया... तेज़ी से मेकअप कर रहे मेरे हाथ एकदम से रुक गए... चेहरा,हाथ और दिल तीनों कान के रास्ते आने वाली उस आवाज़ का इंतज़ार करने लग गए जो ये बताती कि ये सिर्फ एक भद्दा मज़ाक था... लेकिन वो आवाज़ नहीं आयी, कभी नहीं.... &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;20 फरवरी 2010--- ब्लॉग पर ये सब लिखते लिखते सबकुछ याद आ रहा है... निर्मल दा कि मौत की खबर सुनने के बाद जितना मैं सकते में था उतना हीं शायद कुछ और लोग भी... एक को-एंकर थोड़े हीं देर बाद टेलीविज़न की दुनिया की कुछ मनोरंजक खबरें सुना रहीं थीं लेकिन चेहरे पर भाव अब भी निर्मल दा के साथ थे शायद और इसीलिए वो सहज नहीं दिख रही थी... चेहरे से मुस्कान गायब थी उसकी... मजबूरन उसे स्टूडियो में जाकर याद दिलाना पड़ा कि हम सिर्फ एंकर नहीं, ऐक्टर्स भी हैं... जो हमें देख रहे हैं उन्हें नहीं पता कि हमारी जिन्दगी में क्या चल रहा है... और जैसे एक ऐक्टर के लिए शो चलता रहता है और दुनिया को कभी उसके दर्द का पता नहीं चलता... कुछ वैसे हीं हम एंकर्स का भी काम है... यकीन मानिए, आंसू और तकलीफ छुपाकर मुस्कुराते हुए 'नमस्कार' बोलने से बड़े चैलेंज कम हीं होंगे....&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;खैर, इन सबके बीच, निर्मल दा का शुक्रिया भी... इसलिए क्योंकि उन्होंने हमेशा प्यार दिया और सहज बने रहना तो सिखाया हीं, साथ हीं जाते जाते भी जीवन का सबसे 'निर्मल' सच बता गए और वो सच है.... 'अलविदा'... चार तारीख को मेरी दीवानगी नाम के कार्यक्रम में एंकर लिंक शूट करते वक्त उन्होंने कार्यक्रम के अंत में कहा था 'अलविदा'... लेकिन इस बात से अंजान कि ये कैमरे के सामने शायद उनका आखिरी 'अलविदा' है... या फिर यूं कहें कि दुनिया को आखिरी 'अलविदा'... जीवन का सबसे बड़ा सच यही है शायद... उसकी अनिश्चितता... उसकी Uncertainity... किसी को नहीं पता कि वो अगले कुछ मिनटों का मेहमान है यहां, कुछ घंटों का, दिनों का, महिनों का या फिर सालों का... लेकिन सब पागल हुए जा रहे हैं अपने अगले न जाने कितने सालों कि चिंता में... कुछ ऐसे भी हैं जो बीते सालों को हीं सहेजने में जुटे हैं... लेकिन निर्मल दा ने जिस निर्मल सत्य से रुबरु करवाया वो यही कहता है कि जिन्दा सिर्फ ये एक लम्हा है... वो एक लम्हा जिसमें मैं ये ब्लॉग लिख रहा हूं... और वो एक लम्हा जिसमें आप ये ब्लॉग पढ़ रहे हैं... सच से आंखें मोड़ना हीं इंसान को झूठा बना देता है... और ये झूठ तो इतना खतरनाक है कि हम सोच भी नहीं सकते... किसके अलविदा कहने का वक्त कब आ जाए, क्या पता... और इसलिए अलविदा कहने के पहले वो सबकुछ कहो जो हमेशा से अपने करीबियों या प्यार करने वालों को कहना चाहते थे... वो सबकुछ करो जो करना चाहते थे... वो सबकुछ देखो जो देखना चाहते थे... वो सबकुछ सुनो जो सुनना चाहते थे... ताकि अलविदा कहो भी तो शान से... और दिल में किसी 'काश...' के लिए कोई जगह ने बचे.... &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आप और आपकी सीख हमेशा याद रहेगी निर्मल दा... फिलहाल के लिए आपको अलविदा... हम फिर मिलेंगे... :-)&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7953000159750832439-1805898800485455405?l=sinhasushant.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sinhasushant.blogspot.com/feeds/1805898800485455405/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://sinhasushant.blogspot.com/2010/02/blog-post.html#comment-form' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7953000159750832439/posts/default/1805898800485455405'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7953000159750832439/posts/default/1805898800485455405'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sinhasushant.blogspot.com/2010/02/blog-post.html' title='जीवन का &apos;निर्मल&apos; सच-- अलविदा'/><author><name>Sushant Sinha</name><uri>http://www.blogger.com/profile/15423665229773619092</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7953000159750832439.post-7181567318683598355</id><published>2010-02-11T09:17:00.002+05:30</published><updated>2010-02-11T09:37:12.349+05:30</updated><title type='text'>जिन्दगी के Exams</title><content type='html'>कई बार परेशानियां और मुश्किल वक्त हौसला डिगाने का ज़रिया बनते हैं और कई बार खुद को ढूंढ निकालने का माध्यम.... मेरे साथ दोनों ही हुआ... पहले हौसला डिगा और जब खुद को शांत रखकर वक्त और हालात को समझने की कोशिश की तो खोए हुए खुद को भी पा लिया.... लेकिन साथ हीं कुछ और भी था जो मिल गया... शायद तोहफे की तरह... एक समझ, जो जिन्दगी को देखने का नया नजरिया दे गयी....&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैंने पाया कि जिन्दगी में हमें स्कूल या कॉलेज की हीं तरह कई Exams देने पड़ते हैं... Exam पास किया तो आगे बढ़ते हैं वरना उसी क्लास में रहना पड़ता है औऱ Exam फिर से देना पड़ता है.... थोड़ा और समझाने की कोशिश करुं तो मतलब ये कि जिन्दगी एक टीचर की तरह है और हम स्टूडेंट... जिन्दगी कुछ न कुछ सीखा रही है... औऱ सीखाने का बाद वो टेस्ट लेती है कि हमने वाकई सबक सीखा या नहीं.... और जब तक हम उस टेस्ट को पास नहीं कर जाते हम बार बार वैसी हीं परिस्थितियों का सामना करते हैं जिन्दगी में.... यानि उसी क्लास में अटके रहते हैं...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उदाहरण के तौर पर... मान लिजिए आप एक रिश्ते में हैं....यानि रिलेशनशिप में या फिर कहूं कि प्रेम में.... रिश्ता चल रहा है... पर रिश्ता टूटता है... ज़ाहिर है, कमियां या गलतियां दोनों तरफ से रही होंगी... और आप ऐहसास करते हैं कि बस बहुत हो गया, अब और नहीं... और आप अलग हो जाते हैं.... ये एक आम उदाहरण है... लेकिन जिन्दगी के लिहाज़ से, जिन्दगी आपको कुछ सीखा रही थी और उस रिश्ते का बुरा वक्त उस टेस्ट की तरह था जो उस जोड़े को पास करना था... पर वो टेस्ट फेल कर गए... मतलब ये कि अब दोनों प्यार की क्लास में हीं रह जायेंगे... वो अगली क्लास तक नहीं जा सकते.... उन्हें पहले ये टेस्ट पास करना हीं होगा.... और इसलिए जिन्दगी, कुछ महीनों बाद या कुछ सालों बाद एक बार फिर दोनों की जिन्दगी में किसी न किसी को लेकर आयेगी... और आपको फिर इम्तिहान देना होगा... इस बार Question Paper अलग हो सकता है लेकिन सिलेबस वही होगा... और यकीन मानिए,अगर आप फिर फेल हुए...तो नतीजा वही होगा... आपको फिर एक रिश्ते से गुजरना हीं होगा और ये रिश्ता तबतक जारी रहेगा जबतक की आप ये साबित नहीं कर देते कि हां, आप सबक सीख चुके हैं... यानि आप पास हो गए हैं....&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसलिए, इन Exams में फेल होने के बाद रोने, तड़पने, खुद को कोसने से बेहतर हैं खुद को सच को मानने के लिए तैयार करना कि हां, आप फेल हो चुके हैं... क्योंकि फेल होना कतई बुरा नहीं है... बुरा है सबक को ना सीखना या यूं कहूं कि फेल होने की वजह को नज़रअंदाज़ कर देना... लेकिन फेल होने का फायदा ये भी है कि आप उस पूरे सिलेबस को फिर से पढ़ पाएंगे और बेहतर समझ के साथ Exam दे पायेंगे... बशर्ते कि आप ऐसा चाहते हों... ज्यादातर लोग रोने-धोने और मातम मनाने में और वक्त में फंसे रह जाने में हीं इतना वक्त बिता देते हैं कि अगला Exam सिर पर आकर खड़ा होता है और आप इस बात को समझ भी नहीं पाते कि आप फेल दरअसल हुए क्यों थे.... &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ऐसे Exams जिन्दगी के हर मोड़ पर हम सब को देने हैं.... आगे बढ़ना है तो क्लास को पास करना हीं होगा... इम्तिहान में पास होना हीं होगा... नहीं होंगे, तो दुबारा Exam देना हीं होगा... इसलिए, सच को मानकर, समझकर, खुद को संभालकर औऱ जिन्दगी क्या और क्यों सीखा रही है इसका आंकलन करते हुए हीं आगे बढ़ना होगा हमें.....&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7953000159750832439-7181567318683598355?l=sinhasushant.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sinhasushant.blogspot.com/feeds/7181567318683598355/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://sinhasushant.blogspot.com/2010/02/exams.html#comment-form' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7953000159750832439/posts/default/7181567318683598355'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7953000159750832439/posts/default/7181567318683598355'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sinhasushant.blogspot.com/2010/02/exams.html' title='जिन्दगी के Exams'/><author><name>Sushant Sinha</name><uri>http://www.blogger.com/profile/15423665229773619092</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7953000159750832439.post-1528839440363951202</id><published>2010-01-08T23:38:00.003+05:30</published><updated>2010-01-09T00:10:40.076+05:30</updated><title type='text'>गब्बर के साथ नाइंसाफी करने वाले हैं 'इडियट'</title><content type='html'>इडियट तीन और गब्बर एक.... बहुत नाइंसाफी है.... &lt;br /&gt;जी हां... सचमुच गब्बर के साथ नाइंसाफी हो रही है... हां, हां... वही शोले वाला गब्बर... दरअसल, आजकल थ्री इडियट्स की चर्चा आम है... जिसे देखो, इसे आजतक की सबसे कमाल की फिल्म बताने में जुटा है... कुछ पंडितों ने तो गब्बर तक को नहीं बख्शा और कह डाला कि आमिर की फिल्म 3 इडियट्स तो शोले की भी बाप है... औऱ जब तर्क वितर्क की बारी आयी तो आंकड़ों की जादूगरी दिखाने लगे... कह डाला कि इतने कम दिनों में तीन इडियट्स ने बाक्स ऑफिस पर तकरीबन 284 करोड़ का डाका डाला लेकिन जबकि गब्बर क्या, जय-वीरु और पूरे रामगढ़ की भी औकात नहीं थी कि इतनी कमाई कर पाते, इतने कम दिनों में....&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक बारगी सुनों तो सबकुछ सच लगता है लेकिन कुछ बातों पर गौर करें तो साफ हो जाएगा कि इडियट्स की तादात तीन नहीं बल्कि कहीं ज्यादा है...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सबसे पहली बात तो ये कि जब शोले रिलीज़ हुई थी,यानि की साल 1975 में तब टिकट के दाम हुआ करते थे एक या दो रुपए... और आज किसी भी शहर में टिकट की कीमत 150 रुपए से कम नहीं है.... तो फिर दोनों की कमाई की तुलना कैसे हो सकती है.... यानि बहुत साफ है कि जहां शोले के 1000 टिकट बिकने पर 1 या 2 हजार रुपए की कमाई होती होगी वहीं 3 इडियट्स के हज़ार टिकट 1.5 लाख का रेविन्यू जेनरेट करते हैं... तो तुलना हीं बेमानी है....&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दूसरी बात ये कि शोले के ज़माने में थियेटर गिने चुने होते थे.... आजकल मल्टीप्लेक्सेस का ज़माना है... अब आप हीं सोचिए की 1975 के ज़माने के 150-200 सीटों वाले (वो भी खटमल और स्प्रिंग निकले हुए सीटों वाले) सिनेमा घरों में फिल्म देखने वालों की तादात और आज के अनगिनत मल्टीप्लेक्सेस में फिल्म देखने जाने वालों की संख्या में ज़मीन आसमान का फर्क होगा या नहीं....&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तीसरी बात.... 70 के दशक में ज्यादातर घरों में फिल्म देखना पाप के समान था... अगर फिल्म देखी भी जानी है तो पूरा परिवार साथ जाकर देखेगा और वो भी संतोषी मां या कोई और धार्मिक फिल्म है तो बात कुछ और है... शोले जैसी फिल्म में अर्धनग्न हेलन के डांस से तो ज्यादातर परिवार हाय-तौबा करते थे.... लेकिन आजकल तो ए सर्टिफिकेट वाली फिल्में भी खुलेआम और धड़ल्ले से देखी जाती है... वो भी परिवार के साथ... फिल्म देखना शौक कम... जरुरत ज्यादा बन गया है... क्योंकि बड़े शहरों में मोटी कमाई करने वाले लोग रिलैक्स होना चाहते हैं...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चौथी बात.... गब्बर क्या, गब्बर के बाप ने भी सात समंदर पार रिलिज़ होने के बारे में नहीं सोचा होगा कभी उस ज़माने में... पर ये तीन इडियट्स तो हंसते-खेलते और उछलते हुए चले गए विदेश और कमा रहे हैं करोड़ों... अब बताइए... देसी गब्बर और मल्टीनैश्नल 3 इडियट्स की तुलना बेईमानी नहीं है....&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हां, इतना जरुर है कि पायरेटेड सीडी की मार गब्बर ने नहीं झेली थी... जो थ्री इडियट्स झेल रहे हैं... पर बावजूद इसके कमाई के तौर पर दोनों की तुलना नहीं की जा सकती.... साथ हीं, दोनों फिल्मों का फ्लेवर भी बिलकुल जुदा है... एक्शन से भरपूर शोले का और थ्री इडियट्स का कमपैरिज़न कुछ वैसा हीं है जैसे आप चिकन बिरयानी और गुलाब जामुन का कमपैरिज़न करें.... संभव हीं नहीं है....&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;और ऐसे में सच यही है कि गब्बर आज भी इन तीन इडियट्स का बाप है... और सिर्फ आंकड़ों के आधार पर गब्बर को रुलाने वालों को खुद गब्बर हाथ में दोनाली बंदूक लिए ढूंढ़ रहा है और पूछ रहा है कि बताओ.. कितने इडियट्स थे... और शायद जवाब है.... सरदार 'अनगिनत'...&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7953000159750832439-1528839440363951202?l=sinhasushant.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sinhasushant.blogspot.com/feeds/1528839440363951202/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://sinhasushant.blogspot.com/2010/01/blog-post.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7953000159750832439/posts/default/1528839440363951202'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7953000159750832439/posts/default/1528839440363951202'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sinhasushant.blogspot.com/2010/01/blog-post.html' title='गब्बर के साथ नाइंसाफी करने वाले हैं &apos;इडियट&apos;'/><author><name>Sushant Sinha</name><uri>http://www.blogger.com/profile/15423665229773619092</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7953000159750832439.post-6028170854890040950</id><published>2009-12-01T14:02:00.006+05:30</published><updated>2009-12-02T04:06:09.592+05:30</updated><title type='text'>26/11, मुंबई और असली आतंकवादी</title><content type='html'>" समझ नहीं आता, तारीखों से क्या रिश्ता है... क्या 26/11 के ज़ख्मों से खून सिर्फ आज के हीं दिन रिसता है..... ??? "&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ये वो लाइनें हैं जो 26 नवंबर को लिख पाया बस... लेकिन जब से मुंबई का दौरा कर के लौटा था तब से हीं सोच रहा था कि इस बाबत कुछ लिखुंगा.... पर समय नहीं मिल पाया... &lt;br /&gt;26/11 पर बनने वाली एक डॉक्यूमेंट्री के सिलसिले में मुंबई गया था.... 3 दिन शूट किया... हर उस जगह को करीब से देखा जहां की दीवारों, गलियों और सडकों तक से खून रिस रहा था एक साल पहले.... लोगों को भी देखा.... जिन्होंने ये सब देखा और झेला है.... जिनके आस-पास हादसा तो हुआ लेकिन वो महज़ viewer भर थे, उनके लिए 26/11 को याद करना, कैमरे के सामने सब बोलना, कहानी की तरह बताना.... बहुत मुश्किल नहीं था... कुछ तो शायद बोलते बोलते प्रोफेश्नल हो गये थे.... कामा हॉस्पिटल में एक शख्स मिला जिसने कसाब के साथ बीस मिनट बिताये थे.... और जिन्दा बच गया था.... मिलकर मुझे लगा कि शायद इसकी रुह तक कांप जाये हमें उस दिन के बारे में बताने में... लेकिन उसने तो टेक पर टेक दिये... सबकुछ इनऐक्ट कर के बताया.... यहां तक कि जब हम उससे पहली बार मिले और लिफ्ट का इंतज़ार कर रहे थे तो मैंने बातों बातों में उससे पूछा कि उस दिन हुआ क्या था... और उसने कहा... देखो साहब, बार बार नहीं बताउंगा... घबराओ मत, ऊपर चलो... सब ऐक्ट कर के दिखाउंगा... मेरे तो होश फाख्ता हो गये.... क्योंकि जब उसने कहा कि वो नहीं बताएगा तो मुझे लगा कि बेचारे के जख्म हरे हो जाते होंगे शायद बार बार बताने में लेकिन फिर लगा कि नहीं ये तो हैबिच्वुअल हो चुका है और अपना समय बरबाद नही करना चाहता....इंटरव्यू खत्म होने के बाद तस्वीर और साफ हुई कि उसे बस पैसे चाहिए थे.... थोड़े और............&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लोग हंस रहे थे.... मस्त थे... बेखौफ हर उस जगह, जहां हमला हुआ था, मौजूद थे.... मुझे लगा शायद प्रशासन की तैयारियों ने इस बेखौफी को जन्म दिया है... लेकिन उनसे बात करके पता चला कि नहीं, उनसब को पूरा यकीन था कि मुंबई पर दुबारा ऐसा हमला हो सकता है.... फिर क्या चीज़ थी जो उन्हें डरने नहीं दे रही थी.... &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस सवाल को साथ लिए मुंबई से दिल्ली वापस आ गया....और इस बात का जवाब मिला मुझे 26/11 के दिन शो एंकर करते वक्त, जब एक 10 साल की बच्ची हमारे साथ मुंबई से लाइव बैठी.... मुंबई हमलों में उसने टांगे गंवा दी हैं और कसाब मामले की सबसे कम उम्र की गवाह है वो.... बातचीत ठीक चल रही थी... मैं शायद उसका दर्द उससे ज्यादा महसूस कर पा रहा था... पर शो के अंत में जब उसका धन्यवाद करने लगा तो वो अचानक बोल पड़ी कि मैं लोगों से कहना चाहती हूं कि मेरा स्कूल में ऐडमिशन कराओ, मुझे घर चाहिए और टीवी भी और....... वो बोल हीं रही थी साउंड इंजीनियर ने पीसीआर से उसका ऑडियो काट दिया.... मैं सन्न था... जैसे तैसे शो वाइंड अप किया.... और उस वक्त लगा कि मुंबई में जो देखा और उस मंज़र ने जो सवाल पैदा किए उनसब का जवाब इस छोटी सी बच्ची ने दे दिया.... &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हर दर्द, हर तकलीफ शायद कुछ पल के बाद नहीं लौटती लेकिन भूखे पेट की हीं तकलीफ ऐसी है जो हर कुछ घंटों के बाद मुंह बाये सामने खड़ी हो जाती है.... और इसीलिए, किसी को डर नहीं लगता किसी आतंकी हमले से, किसी कसाब से, किसी अबु इस्माइल से... या फिर कहूं कि ज्यादा देर डर नहीं लगता क्योंकि सबको पता है कि इनसे डर गए तो पेट की आग जला कर मार देगी.... आतंकियों से तो फिर भी 60 घंटे लड़ा जा सकता है,जंग जीती जा सकती है लेकिन भूखे पेट का आतंक 60 घंटे क्या, 6 घंटे में हीं वो दर्द देने लगता है जो शायद AK-47 की गोलियां भी न देती होंगी.... &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;26/11 के आतंकियों ने भी सबकुछ धर्म के नाम पर भले किया हो लेकिन वो भी अपने परिवार वालों को भूख के आतंक से दूर रखने के लिए हीं खुद सूली चढ़े.... ये भी एक सच है....&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;और शायद सबसे बड़ा सच ये है कि हर दिन एक 26/11 है... जहां हम सब जिन्दा रहने की लड़ाई लड़ रहे हैं... और आतंकी भूख, घात लगाये बैठी है....&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7953000159750832439-6028170854890040950?l=sinhasushant.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sinhasushant.blogspot.com/feeds/6028170854890040950/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://sinhasushant.blogspot.com/2009/12/2611.html#comment-form' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7953000159750832439/posts/default/6028170854890040950'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7953000159750832439/posts/default/6028170854890040950'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sinhasushant.blogspot.com/2009/12/2611.html' title='26/11, मुंबई और असली आतंकवादी'/><author><name>Sushant Sinha</name><uri>http://www.blogger.com/profile/15423665229773619092</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7953000159750832439.post-5707375950896834897</id><published>2009-10-04T20:03:00.002+05:30</published><updated>2009-10-04T20:24:07.523+05:30</updated><title type='text'>हम सब गाडियां हैं---- पार्ट 2</title><content type='html'>अगर आपने 'हम सब गाडियां हैं---पार्ट 1' पढ़ा है तो आप वाकिफ होंगे कि दरअसल हम सब गाडियां कैसे हैं.... लेकिन अगर मन में सवाल रह गए हों तो इसे भी पढ़ें क्योंकि मैं गाड़ियों को जितना देखता हूं आजकल, मेरा यकीन बढ़ता चला जाता है कि वाकई हममें और गाड़ियों में बहुत कुछ कॉमन है......&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आपने कभी एक अयोग्य बॉस के नीचे काम किया है.... जरूर किया होगा.... दुनिया भरी पड़ी है ऐसे खुशकिस्मतों से जो हैं दो कौड़ी के नहीं लेकिन बॉस बने बैठे हैं.... एक दिन मैं गाड़ी चला रहा था तो अचानक मेरी नज़र ब्लू लाइन बस पर गयी.... मैं हार्न देता रहा और वो बस मज़े से पूरे सड़क को घेर कर चलती रही.... और तभी मुझे लगा कि अरे... ये तो बिलकुल मेरे बॉस की तरह है.... वो भी ऐसे हीं 10 की स्पीड से मज़े से पूरी सड़क को बाप का मान कर चल रहा है.... और हम कुछ नहीं कर पा रहे.... सिवाये इसके की कुढ़ते रहें और पीछे पीछे चलते रहें.... बीच बीच में कभी कभी हार्न बजाकर विरोध जता देते हैं....लेकिन घांय घांय करके चलने वाली उस ब्लू लाइन बस को कहां हमारी मासूम सी हार्न सुनाई देने वाली है.... वो तो बस चला जा रहा है, मस्त चाल से.... हां, बीच बीच में कुछ लोगों ने ज़ोर लगाया और अपनी गाड़ी फुटपाथ पर चढ़ाते हुए आगे निकल गए.... लेकिन इस मुई ब्लू लाइन पर तो उसका असर भी नहीं हुआ.... वो तो अब भी यही कह रही है.... 'जगह मिलने पर पास देंगे.... ओके टाटा'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वैसे कुछ बॉसेस इससे भी घटिया होते हैं.... दरअसल ब्लू लाइन बस के साथ कम से कम इतना तो है कि वो कुछ लोगों को साथ बिठाकर थोड़ी दूर ले तो जाती है.... पर कुछ बॉस तो ऑटो की तरह होते हैं.... जो दो से ज्यादा लोगों को साथ लेकर चल भी नहीं सकते.... आपको आगे निकलने का मौका भी नहीं देंगे.... इधर उधर खरोंच भी लगाएंगे.... जबरदस्ती, बेवजह पीं पीं वाले हार्न की तरह बजते रहेंगे.... कभी भी बीच सड़क पर खराब होकर अपने पीछे पता नहीं कितनों को फंसा देंगे.... और देखने में भी बदसूरत होते हैं..... पर इनके साथ अच्छी बात ये रहती है कि अगल बगल जगह इतनी छोड़ते हैं कि कोई भी आगे निकल जाये.... और स्पीड भी इतनी नहीं होती कि आपको खदेड़ कर नुकसान पहुंचा सकें... जो कि ब्लू लाइन जरूर कर सकती है.... &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;और आखिर में एक तीसरे तरीके के बॉसेस भी होते हैं जो किसी भी तरह की गाड़ी हो सकते हैं लेकिन उनका ड्राइवर यानि की इनका दिमाग.... किसी काम का नहीं होता.... ऐसे बॉसेस के पीछे चलते वक्त जितनी कम रफ्तार से चलें उतना अच्छा है क्योंकि ये कभी भी ब्रेक मार कर आपकी गाड़ी का हाल बिगाड़ सकते हैं.... ऐसे बॉसेस दिमाग का दही करने में बेहद कुशल माने जाते हैं.... हालांकि इनकी अयोग्यता के कारण आप कभी भी इन्हें ओवरटेक कर सकते हैं लेकिन उन्हें कभी इस बात का एहसास ना होने दें.... और अगर होने दे भी दिया तो क्या.... वो तो सड़क पर गाड़ी के पीछे पीछे दौड़कर भौंकने वाले कुत्तों से भी ड़रते हैं तो आप तो फिर भी........&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;खैर ये खास संस्करण बॉसेस को समर्पित था..... &lt;br /&gt;जल्द लेकर आऊंगा.... हम सब गाड़ियां हैं----- पार्ट 3,&lt;br /&gt;तब तक ये बताना ना भूलें कि आपका बॉस कौन सी गाड़ी की तरह है.... कोइ नई कैटेगरी का हो तो शेयर करें.....&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7953000159750832439-5707375950896834897?l=sinhasushant.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sinhasushant.blogspot.com/feeds/5707375950896834897/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://sinhasushant.blogspot.com/2009/10/2.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7953000159750832439/posts/default/5707375950896834897'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7953000159750832439/posts/default/5707375950896834897'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sinhasushant.blogspot.com/2009/10/2.html' title='हम सब गाडियां हैं---- पार्ट 2'/><author><name>Sushant Sinha</name><uri>http://www.blogger.com/profile/15423665229773619092</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7953000159750832439.post-6207652735652256234</id><published>2009-09-24T22:25:00.000+05:30</published><updated>2009-09-24T22:45:33.413+05:30</updated><title type='text'>रिश्ते मुझे उलझाने लगे हैं........</title><content type='html'>रिश्ते आजकल मुझे उलझाने लगे हैं... कई बार समझ में नहीं आता कि कौन सा रिश्ता किस मकसद से है... कई बार तो ये भी समझ में नहीं आता कि क्या हर रिश्ता किसी न किसी मकसद से होता है... औऱ अगर नहीं तो फिर क्या कोई भी बेवजह हीं जिन्दगी में आकर चला जाता है... संभव नहीं लगता... क्योंकि हम सब बिना वजह तो इस दुनिया में नहीं हैं... तो फिर बिना मकसद किसी की जिन्दगी में कैसे घुस सकते हैं और बिना मकसद किसी की जिन्दगी से कैसे निकल सकते हैं... रिश्तों के तारों को जितना सुलझाने की कोशिश कर रहा हूं ये उतने उलझते जा रहे हैं... &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दूसरी एक बात जो आजकल परेशान कर रही है वो ये कि रिश्तों में उम्मीदें पालना सही है या नहीं... यानि कि एक्सपेक्टेशन... बिना उम्मीद के रिश्ते में से जान नहीं चली जायेगी... ??? पता नहीं... लेकिन कई बार ठोकर खाकर लगता है कि क्यों लगाई थी उम्मीद... पर फिर यही उम्मीदें किसी के करीब भी ले जाती हैं...हाल हीं में एक दोस्त के हमेशा सच बोलने की नौटंकी का पर्दाफाश हुआ... वो भी कुछ ऐसे अंदाज में कि सोचा न था... दिमाग झन्ना सा गया... समझ में हीं नहीं आ रहा था कि ये कैसे हो सकता है... और क्यों वो शख्स इतने दिनों तक झूठ बोलता रहा... समझ से परे था मेरे लिए सबकुछ... लेकिन दिमाग जोड़ घटाव करने में लगा रहा कि ऐसा हो कैसे गया... जब दिमाग कि नसें दुखने लगती तो खुद को समझा लेता कि यार... तुम्हें उम्मीद हीं नहीं पालनी चाहिए थी... लेकिन फिर मन में सवाल आया कि बिना उम्मीद रिश्तों का रस खत्म नहीं हो जायेगा... थोड़ी बहुत उम्मीद तो बनती है... और सच बोलना किसी उम्मीद के दायरे में तो नहीं आता...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फिर अचानक खबर मिली एक दोस्त की मां की तबीयत बहुत खराब होने की... डॉक्टरों ने जवाब दे दिया है... सन्न खड़ा रह गया मैं थोड़ी देर के लिए सुनकर ... मैं किसी करीबी को खोने का गम जानता हूं... और शायद यही आंकलन करने लग गया था कि क्या होगा जब उसकी मां नही होगी... फिर एक सवाल कौंधा... कि क्या बेहतर है... किसी आदमी का मर कर हमारे जीवन से चले जाना... जिसमें वापसी की कोइ उम्मीद नहीं रहती या किसी शख्स का जीवित रहते हुए हमें छोड़ कर चले जाना... जिसमें हर लम्हा इंतजार में बीतता है... मुझे तुरंत जवाब नहीं मिला... क्योंकि मैंने दोनों परिस्थितियां झेली हैं... जब मेरे पिता मेरे जीवन से गए तो मैं अक्सर ये सोचता था कि कोई अभी दौड़ा दौड़ा आयेगा और कहेगा कि वो अब भी जिन्दा हैं... जो लाश मैंने देखी थी वो किसी और की थी... औऱ सब अच्छा हो जायेगा... लेकिन ऐसा कभी नहीं हुआ... पर इंतजार उस दौड़ कर आते शख्स का आज भी है... साथ हीं मैंने कई करीबी लोगों को जीवन में दूर जाते भी देखा... वैसे लोग जो जिन्दा हैं... जीवन के किसी मोड़ पर शायद कभी मिल भी जायें... पर उनसे मिलने की उम्मीद भी कम कसक पैदा नहीं करती... पर तय करना मुश्किल है कि दर्द किसमें ज्यादा होता है.... &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;खैर इतना जरूर है... कि रिश्ते मुझे उलझा रहे हैं... कई बार तो ये भी समझ नहीं आता कि क्या रिश्तों में नाप-तोल कर बोलना, सच-भूठ का परसेंटेज तय करना... ये सब हो सकता है क्या... क्यों हर रिश्ता इतना उलझा है... समझ नहीं आ रहा.....................................&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7953000159750832439-6207652735652256234?l=sinhasushant.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sinhasushant.blogspot.com/feeds/6207652735652256234/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://sinhasushant.blogspot.com/2009/09/blog-post.html#comment-form' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7953000159750832439/posts/default/6207652735652256234'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7953000159750832439/posts/default/6207652735652256234'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sinhasushant.blogspot.com/2009/09/blog-post.html' title='रिश्ते मुझे उलझाने लगे हैं........'/><author><name>Sushant Sinha</name><uri>http://www.blogger.com/profile/15423665229773619092</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7953000159750832439.post-1419646013743323661</id><published>2009-07-24T22:52:00.004+05:30</published><updated>2009-07-24T23:18:00.566+05:30</updated><title type='text'>ये नाइंसाफी क्यों ???</title><content type='html'>जीवन में वैसे तो आजकल सोचने और दुखी होने के लिए वैसे हीं कुछ कम बातें नही हैं... लेकिन कल अचानक एंकरिंग करते करते कान में पीसीआर से आयी खबर ने हद से ज्यादा दुखी किया और बहुत कुछ सोचने पर मजबूर कर दिया... खबर पटना की थी, जहां का मैं रहने वाला हूं.... एक लड़की के साथ बीच सड़क पर, सैंकड़ों की भीड़ के सामने बदसलूकी की गयी... और शायद बदसलूकी भी कम शब्द है.. क्योंकि उस लड़की को उस भीड़ में, बीच सड़क पर, सरेआम नंगा कर दिया गया... कैमरा भी था वहां,सबकुछ अपने अंदर उतारता हुआ ताकि उस लड़की की बेइज्जती को और सार्वजनिक बनाया जा सके... उसके कपड़े और इज्ज़त तार तार कर दिए गए...तस्वीरें देखकर पता नहीं क्यों पर मैं शून्य में चला गया...बिलकुल ब्लैंक था मैं...  लेकिन तब तक उपर से कान में एक और निर्देश आया कि विजुअल देखकर कमेंट्री करें... ऐसा लगा जैसे सीना चीर दिया हो किसी ने... एक लड़की की जिन्दगी बीच सड़क पर कैसे सबके सामने बर्बाद कर दी गयी इसपर संजय की तरह आंखों देखा हाल बताऊं... दिल सचमुच अंदर से रोता रहा और मैं बोलता रहा... थोड़ी देर बाद बुलेटिन खत्म हो गया.... पर वो तस्वीरें ज़हन से जाती नहीं... वैसे भी दो-तीन दिन से ढंग से सोया नहीं पर जब आंखें बोझिल होती हैं तो अचानक से उस लड़की का ख्याल आ जाता है... क्या वो सो पा रही होगी... क्या बीत रही होगी उसपर... और वो, वो कैसे सो रहे होंगे जो वहां तमाशबीन बने सबकुछ देखते रहे और कुछ नहीं किया... कितना आसान होता है ना, ऐसा कुछ करो या देखो और फिर घर जाकर सो जाओ... या भूल जाओ... लेकिन जिसपर बीती... वो 15 मिनट की घटना उसकी जिन्दगी का ऐसा नासूर है जो रह रहकर चुभेगा और उसमें से खून रिसेगा... &lt;br /&gt;कई बार सोचता हूं... कि अगर भगवान सबको एक नजर से देखता है तो उसने बनाते वक्त इतनी नाइंसाफी क्यों की... क्यों लड़कियों को हीं हर तकलीफ झेलने की किस्मत दी... बलात्कार हो तो लड़की का, छेड़ा जाए तो लड़की को, सरेआम नंगा करके घुमाया जाये तो लड़की को और बच्चे पैदा करने का असहनीय दर्द भी झेलना पड़े तो लड़की को... क्यों.... क्यों लड़कों को उस दर्द का एहसास करने जैसी कोई सज़ा नहीं दी... क्यों बराबरी का हिस्सा क्यों नही दिया... और उसपर ये बेशर्मी भी दे दी हमें कि सरेआम किसी लड़की को नंगा होते हुए देखें और मुसकुराएं... क्या पटना में उस लड़की की जगह, उस भीड़ में से किसी की मां, बहन, बेटी या बीवी होती तो भी वो शख्स वैसे हीं देखता... क्या तब भी वो वैसे हीं आराम से जाकर सो जाता... क्या वो लड़की किसी की कुछ नहीं होते हुए भी एक इंसान नहीं थी... जिसे खुश रहने का हक है... जिसे इज्जत से रहने का हक है... जिसे जिन्दगी जीने का हक है... लेकिन जिसे हमसब ने मिलकर एक ऐसा दर्द दिया है जो कभी नहीं जायेगा... क्यों... क्यों हुआ ये सब... और क्यों बदलता नहीं कुछ भी???&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7953000159750832439-1419646013743323661?l=sinhasushant.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sinhasushant.blogspot.com/feeds/1419646013743323661/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://sinhasushant.blogspot.com/2009/07/blog-post_24.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7953000159750832439/posts/default/1419646013743323661'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7953000159750832439/posts/default/1419646013743323661'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sinhasushant.blogspot.com/2009/07/blog-post_24.html' title='ये नाइंसाफी क्यों ???'/><author><name>Sushant Sinha</name><uri>http://www.blogger.com/profile/15423665229773619092</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7953000159750832439.post-2396887469428667256</id><published>2009-07-17T13:40:00.000+05:30</published><updated>2009-07-17T13:41:17.260+05:30</updated><title type='text'>बांधो बस्ता, आगे बढ़ो......</title><content type='html'>बांधो बस्ता आगे बढ़ो&lt;br /&gt;लंबा है रस्ता आगे बढ़ो&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;माथे पर पसीना &lt;br /&gt;हालत खस्ता&lt;br /&gt;हर मोड़ पर पड़े&lt;br /&gt;परेशानियों से वास्ता&lt;br /&gt;रुकना मत&lt;br /&gt;झुकना मत&lt;br /&gt;सांसे थामे, सब से लड़ो&lt;br /&gt;बांधो बस्ता, आगे बढ़ो&lt;br /&gt;लंबा है रस्ता, आगे बढ़ो&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जो गुज़र गया &lt;br /&gt;उसका दुख कदमों को डगमगाये नही&lt;br /&gt;जो मिल रहा है&lt;br /&gt;वो सांसों में समाने से पहले गुज़र जाये नहीं&lt;br /&gt;जो मिलेगा आगे&lt;br /&gt;उसका कौतूहल और उत्साह मन में भरो&lt;br /&gt;बांधो बस्ता आगे बढ़ो&lt;br /&gt;लंबा है रस्ता, आगे बढ़ो&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गलत मोड़ मुड़ने पर भी जोश कम ना हो&lt;br /&gt;जो साथ नहीं अब उनका अफसोस न हो&lt;br /&gt;थकते हों कदम या उफनती हो धड़कन&lt;br /&gt;सफर के फासले का होश ना हो&lt;br /&gt;जो बोझिल करे रास्ता&lt;br /&gt;ऐसे बोझ को कंधे से उतारो&lt;br /&gt;जीयो हर लम्हा&lt;br /&gt;मील के पत्थर गाड़ो&lt;br /&gt;सफर बने यादगार&lt;br /&gt;हर कदम कुछ यूं ज़मीं पर रखो&lt;br /&gt;बांधो बस्ता, आगे बढ़ो&lt;br /&gt;लंबा है रस्ता, आगे बढ़ो&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7953000159750832439-2396887469428667256?l=sinhasushant.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sinhasushant.blogspot.com/feeds/2396887469428667256/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://sinhasushant.blogspot.com/2009/07/blog-post_17.html#comment-form' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7953000159750832439/posts/default/2396887469428667256'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7953000159750832439/posts/default/2396887469428667256'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sinhasushant.blogspot.com/2009/07/blog-post_17.html' title='बांधो बस्ता, आगे बढ़ो......'/><author><name>Sushant Sinha</name><uri>http://www.blogger.com/profile/15423665229773619092</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7953000159750832439.post-4038083210229712691</id><published>2009-07-13T12:56:00.014+05:30</published><updated>2009-07-14T00:51:36.557+05:30</updated><title type='text'>हम सब गाड़ियां हैं....</title><content type='html'>हर रोज़ गाड़ी से दफ्तर आना जाना होता है... रफ्तार से चलती कार और कान फाड़ते स्पीकर... इन्हीं दोनो का साथ होता है... पर एक दिन अचानक एक सोच ने साथ चलना शुरु कर दिया और आस-पास जो कुछ भी था उसे देखकर यही लगा कि हम सब जिन्दगी की सड़क पर चल रही गाड़ियां हैं.... हां, गाड़ियां... अलग अलग मॉडल, रंग, खूबियों और बुराईयों वाली गाड़ियां... किसी का रंग आकर्षक है तो किसी की रफ्तार... कुछ आवाज़ कर रहे हैं तो कुछ बिन आवाज़ हवा से बातें कर रहे हैं... सब अपने अपने सफर पर हैं... किसी को नहीं पता कि साथ चल रही कौन सी गाड़ी किस रेड लाईट पर अलग दिशा में चली जाएगी... किसी को नहीं पता अगले मोड़ पर कौन सी गाड़ी साथ चलने लगेगी... जीवन में कई ऐसे लोगों से मिला जिन्हें देखकर लगता था कि ये इतना स्लो क्यों हैं... जल्दी जल्दी और अच्छा काम क्यों नहीं कर सकते... ??? अब समझ में आया कि दरअसल वो सड़क पर चलने वाले ऑटो की तरह हैं... जो इससे तेज़ चल हीं नहीं सकते... और आवाज़ भी करेंगे ही करेंगे... लेकिन सबसे बड़ा खतरा ये होता कि उनकी चाल किसी बड़ी गाड़ी को डेंट ना पहुंचा दे...और जाने अनजाने बेचारे ऐसा कर हीं जाते हैं... और गाली भी खाते हैं...सड़क पर चलने वाली बसों को देखकर लगा कि ये लीडर(राजनीति वाले नहीं, लीड करने वाले) की तरह हैं जो जगह घेर कर चलते हैं और एक बड़े कुनबे को साथ लेकर चलने की कुव्वत रखते हैं....उनके सफर में कई लोग सवार होते हैं साथ, और जिन्दगी के छोटे मोटे एक्सीडेंट्स से उनका कुछ नहीं बिगड़ता और न हीं उसमें सवार लोगों का वो कुछ बिगड़ने देते हैं...इतना हीं नहीं... योग्यताओं के हिसाब से भी आप लोगों को मारुति 800 से लेकर लिमोज़ीन तक की कैटेगरी में बांट सकते हैं... पर कुछ बिन साइलेंसर की गाडियों की तरह होते हैं... शोर ज्यादा करते हैं काम कम... धुआं भी बहुत छोड़ते हैं... जो दूसरों की आंखों में आंसू तक ले आये...इनसे बचने के दो हीं तरीके हैं, या तो इन्हे आगे जाने दो या खुद अपनी रफ्तार बढ़ाकर तेज़ी से आगे निकल जाओ...  य़ुवाओं को देखता हूं तो लगता है कि शो रुम से अभी अभी निकली नयी गाड़ियां हैं.... भले हीं ऑटो हों या ऑल्टो या फिर बीएमडब्लयू... सब में नयेपन का उत्साह और पर्फारमेंस में कसाव नज़र आता है... पर ये भी तय है कि वक्त के साथ इनमें भी बदलाव आ हीं जायेगा....साथ हीं आजकल के युवा, सीएनजी लगी गाड़ियों की तरह हैं... पहले की गाड़ियों की तरह ज्यादा प्रदूषण नहीं फैलाते... लेकिन अफसोस इनकी तादात कम है....अच्छा, ये भी मान कर चलिए, कि इस सफर में आप किसी न किसी गाड़ी को, चाहे-अनचाहे, ठोक हीं देंगे....लेकिन आपकुछ नहीं कर सकते, सिवाये इसके कि सफर जारी रखें... क्योंकि उस गाड़ी की मरम्मत भगवान के सर्विस सेंटर में हीं होगी...इसके अलावा गाड़ियों का मेनटेनेन्स तय कर देती है कि वो कितनी उम्र तक अपने पर्फारमेंस को बनाये रख पायेंगे... गाडियों की हालत, जिन्दगी की सड़क पर मिलने वाले इमोशनल गढ्ढे भी तय करते हैं... सर्वीसिंग कब कब हुई है... परेशानियों के पंक्चर कितने झेलने पड़े हैं... या फिर उत्साहरुपी पेट्रोल कितनी बार खत्म हुआ है... ये सबकुछ तय करते हैं कि गाड़ी कितनी शान से और कब तक चलेगी... और कब यमराज की क्रेन गाड़ी को उठाकर ले जायेगी... बस बचते चलना है... बढ़ते चलना है... सड़क पर दूसरी गाड़ियां आगे निकलने की कोशिश करेंगी हीं... कुछ गलत साइड से तो कुछ धक्का मारते हुए... हो सकता है परेशानियों का जाम भी मिले... गाड़ी थम तो सकती है पर रुकनी नहीं चाहिए... चलते जाना है... और हां, हर रोज़ गाड़ी को चमका कर, शान से निकलिए सफर पर... और कहते चलिए... 'बुरी नज़र वाले,तेरा मुंह काला' और 'जगह मिलने पर हीं पास देंगे'&lt;br /&gt;ओके...टाटा... हार्न प्लीस... फिर मिलेंगे... (इसी ब्लॉग पर) :)&lt;br /&gt;(निवेदन:- और हां, आप कौन सी गाड़ी हैं... खुद तय करें... और कमेंट सेक्शन में उसका ज़िक्र भी करें... किसी और गाड़ी का ज़िक्र करना चाहें तो वो भी करें और हां, मैं कौन सी गाड़ी लगता हूं आपको, ये भी स्वतंत्रतापूर्वक लिखें...!!!)&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7953000159750832439-4038083210229712691?l=sinhasushant.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sinhasushant.blogspot.com/feeds/4038083210229712691/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://sinhasushant.blogspot.com/2009/07/blog-post_7503.html#comment-form' title='6 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7953000159750832439/posts/default/4038083210229712691'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7953000159750832439/posts/default/4038083210229712691'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sinhasushant.blogspot.com/2009/07/blog-post_7503.html' title='हम सब गाड़ियां हैं....'/><author><name>Sushant Sinha</name><uri>http://www.blogger.com/profile/15423665229773619092</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>6</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7953000159750832439.post-2069196806868187145</id><published>2009-07-08T12:37:00.001+05:30</published><updated>2009-07-08T12:39:35.661+05:30</updated><title type='text'>सही गलत क्या है....???</title><content type='html'>मन बार बार पूछता है&lt;br /&gt;क्या है सही &lt;br /&gt;क्या है गलत&lt;br /&gt;तय करेगा कौन&lt;br /&gt;कौन उठायेगा ये ज़हमत&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पर बंध सी गयी है जिन्दगी&lt;br /&gt;सही-गलत के दायरे में&lt;br /&gt;मन के कोरे कागज पर &lt;br /&gt;सपनों की कलम कुछ नया लिखती ही नहीं&lt;br /&gt;पन्ने तो सारे भर रहे हैं&lt;br /&gt;किसी और का हीं लिखा सुनकर, इस जीवन के मुशायरे में&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जब सब पहले से तय कर&lt;br /&gt;उसने भेज दिया हमें किरदार निभाने&lt;br /&gt;तो हम क्यों लगे हैं&lt;br /&gt;कौन हीरो, कौन विलेन &lt;br /&gt;ये खुद से तय कर&lt;br /&gt;उसकी काबिलियत को आज़माने&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;क्यों न हर रिश्ता दिल से जीयें&lt;br /&gt;क्यों न हर बंधन प्यार के धागे से सीयें&lt;br /&gt;क्या सही किया, क्या नहीं&lt;br /&gt;इस परख को क्यों न मार दें आज यहीं&lt;br /&gt;क्यों हो हमारे हर फैसले की सुनवाई&lt;br /&gt;दिल के सही-गलत की कचहरी में&lt;br /&gt;जब हमारे बस में नही जिन्दगी&lt;br /&gt;तो क्यों न भूला दें हर गम मस्खरी में&lt;br /&gt;हर दिन एक अनुभव हो&lt;br /&gt;बस अनुभव&lt;br /&gt;सही गलत, गलत सही&lt;br /&gt;बहुत हुआ, बस अब और नहीं&lt;br /&gt;बस अब और नहीं.....&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7953000159750832439-2069196806868187145?l=sinhasushant.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sinhasushant.blogspot.com/feeds/2069196806868187145/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://sinhasushant.blogspot.com/2009/07/blog-post.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7953000159750832439/posts/default/2069196806868187145'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7953000159750832439/posts/default/2069196806868187145'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sinhasushant.blogspot.com/2009/07/blog-post.html' title='सही गलत क्या है....???'/><author><name>Sushant Sinha</name><uri>http://www.blogger.com/profile/15423665229773619092</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7953000159750832439.post-3383751463516632379</id><published>2009-05-23T12:04:00.003+05:30</published><updated>2009-05-25T21:31:43.975+05:30</updated><title type='text'>आज फिर हाथ जोड़ा है....</title><content type='html'>आज फिर हाथ जोड़ा है...&lt;br /&gt;कपकपाती रुह में&lt;br /&gt;बेइंतहां कसक है&lt;br /&gt;अनगिनत अनसुलझे सवाल हैं&lt;br /&gt;भीड़ को रौंदती तन्हाई और&lt;br /&gt;दर्द भी थोड़ा है&lt;br /&gt;लेकिन शिकवा करुं तो किससे&lt;br /&gt;क्योंकि&lt;br /&gt;कतरा कतरा&lt;br /&gt;तिनका तिनका&lt;br /&gt;जाने-अनजाने&lt;br /&gt;मैंने हीं तो इन्हें जोड़ा है&lt;br /&gt;और अब&lt;br /&gt;जिन्दगी की इस धुंध भरी राह में&lt;br /&gt;जब आगे नहीं दिख रहा कुछ&lt;br /&gt;तो ये सफर&lt;br /&gt;अब उसपर हीं छोड़ा है&lt;br /&gt;आज फिर हाथ जोड़ा है.....&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नादान दिल की फितरत ठीक नहीं&lt;br /&gt;ना मिले तो रोए बच्चों सा&lt;br /&gt;जो मिले सो खोए बच्चों सा&lt;br /&gt;हर रिश्ता खुद हीं तोड़े&lt;br /&gt;फिर कोने में बैठकर&lt;br /&gt;आंसू भी बहाए थोड़े थोड़े&lt;br /&gt;पर अब जब इसे संभाल कर&lt;br /&gt;नया सपना जोड़ा है&lt;br /&gt;तो अबकी किस्मत ने साथ छोड़ा है&lt;br /&gt;सही गलत की दम तोड़ती समझ के बीच&lt;br /&gt;अब सब उसपर हीं छोड़ा है&lt;br /&gt;आज फिर हाथ जोड़ा है&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7953000159750832439-3383751463516632379?l=sinhasushant.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sinhasushant.blogspot.com/feeds/3383751463516632379/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://sinhasushant.blogspot.com/2009/05/blog-post_23.html#comment-form' title='3 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7953000159750832439/posts/default/3383751463516632379'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7953000159750832439/posts/default/3383751463516632379'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sinhasushant.blogspot.com/2009/05/blog-post_23.html' title='आज फिर हाथ जोड़ा है....'/><author><name>Sushant Sinha</name><uri>http://www.blogger.com/profile/15423665229773619092</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7953000159750832439.post-1008218438172946963</id><published>2009-05-18T11:28:00.003+05:30</published><updated>2009-05-18T12:10:38.704+05:30</updated><title type='text'>आखिरकार एक ऐसा चुनाव जो समझ से परे नहीं है.....</title><content type='html'>पिछले दो महीने की हर रोज़ की चिकचिक और झिकझिक के बाद आखिरकार चुनावों के नतीजे आ गए... लेकिन इन नतीजों ने बतौर युवा मुझे बहुत उत्साहित किया.... इसलिए नहीं कि जीत कांग्रेस की हुई... बल्कि इसलिए की जीत सालों बाद आम आदमी की हुई...  "कई बातें ऐसी होती है ,जिन्हें शब्दों की सजा नहीं देनी चाहिए ..देखा जाए तो यह धरती मजबूरियों का लम्बा इतिहास है"...किसी करीबी के ब्लाग पर अमृता प्रीतम की ये पंक्तियां पढ़ रहा था तो लगा जैसा बिलकुल आज के लिए मौजूं हैं ये पंक्तियां... नेता दो महीने तक चिल्लाते रहे... गाली-गलौच, नोच-खसोट, तरह तरह के हथकंडे अपनाते नेता सिर्फ वोट के लिए, क्या नहीं देखने को मिला इस दौरान... पर आम आदमी चुपचाप सब देखता रहा बिना कुछ कहे... बिना इन बातों को शब्दों की सज़ा दिए उसने हर उस नेता को हार की सबसे बड़ी सज़ा दी जो जीत के हक़दार नहीं थे... वरना किसने सोचा था कि बिहार में रामविलास जैसे नेता की हार होगी वो भी उस सीट पर जहां से वो कभी नहीं हारे और जीते तो अक्सर रिकार्डतोड़ अंतर से...और रामविलास अकेले नहीं हैं.. कई बड़े और दिग्गज नेताओं को जनता ने सच्चाई का आईना दिखाया... और खुशी इसी बात की है इन नेताओं को चुनने की मजबूरी के लंबे इतिहास, के इतिहास बनने की शुरुआत हो गयी है... मुझे इन चुनावों में तीन बातों की सबसे ज्यादा खुशी हुई...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;1. बिहार ने देश का भ्रम तोड़ दिया कि वहां कभी विकास के लिए वोट नहीं डाले जा सकते... मैं खुद बिहार से हूं... और एंकरिंग करते वक्त सांसें थामें इंतज़ार कर रहा था बिहार से आने वाले एक एक नतीजे का... क्योंकि ये चुनाव बिहार के लिए किसी लिटमस टेस्ट से कम नहीं था... और मुझे पता था कि इसबार नहीं तो कभी नहीं... अगर बिहार ने नीतीश कुमार के काम पर रियैक्ट नहीं किया तो बिहार के लिए बहुत बुरा होगा... पर अजीबोगरीब खुशी महसूस कर रहा हूं नतीजों को देख कर...इन नतीजों को देखकर तो एकबारगी ऐसा लगा जैसे  कास्ट पालिटिक्स तो कभी थी हीं नहीं बिहार में....इतना हीं नहीं, जार्ज फर्नांडिस जैसे कद्दावर मगर बुज़ुर्ग नेता कि हार ने दिखाया कि लोगों को अब सिर्फ काम से मतलब है नाम से नहीं... और काम करने के लिए बूढ़ी हड्डियां नहीं बल्कि नया जोश चाहिए... खुश हूं कि लोगों ने बिहार की हार को रोक दिया...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;2. दूसरी सबसे बड़ी खुशी की बात रही.. दागी नेताओं की हार... बिहार हो या यूपी या फिर  देश का कोई और हिस्सा... जनता ने, क्रिमिनल जो आजकल नेता कहलाते हैं, उनहें बताया कि उनकी जगह लोकतंत्र के मंदिर में नहीं बल्कि कहीं और है... बिहार में भी, न सिर्फ शहाबुद्दीन, सूरजभान और पप्पू यादव जैसे नेताओं के रिश्तेदार हारे (इनके न लड़ पाने की सूरत में इनकी पत्नियां मैदान में थीं... पप्पू यादव की तो मां भी चुनाव लड़ी रही थीं.) बल्कि जेडीयू के जादू के बावजूद भी इसी पार्टी के प्रभुनाथ सिंह और मुन्ना शुक्ला जैसे दागी प्रत्याशियों को वोटर नहीं पचा  पाया... य़ूपी में भी यही हाल रहा... मुख्तार अंसारी हो या कोई और... सबके गुनाहों की पहली सज़ा उन्हें जनता ने दे दी और बता दिया कि उनकी दबंगई अब नहीं चलेगी....&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;3.  तीसरी बड़ी खुशी इस बात से हुई कि सरकार कि ताकत इतनी है(नंबर के मामले में) कि छोटी मोटी पार्टियों की हर छींक से उसे घबराने की जरुरत नहीं है... एक देश के विकास के लिए ये बहुत जरुरी है कि सरकार को काम करने की स्वतंत्रता और निर्भीकता मिले... ये नहीं कि छोटी छोटी पार्टीयां कनपट्टी पर बंदूक ताने रहें चौबीसो घंटे और सरकार गिरा देंगे कि धमकी के नाम पर मनचाहा पोर्टफोलियो हासिल करें और हर नीति पर नासमझी का तर्क देती रहें... ऐसी बारगेनिंग करने वाली पार्टियों के लिए भी सबक हैं ये नतीजे...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यानि बहुत साफ है कि जय हो कांग्रेस की नहीं बल्कि 'जय हो वोटर'  होना चाहिए क्योंकि वो अब परिपक्व हो रहा है और उसके दिए नतीजे किसी के भी समझ के परे नहीं हैं.....&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नोट:- वोटर कि इस जागरुक्ता का थोड़ा श्रेय रात रात भर जाग कर काम करने वाले मीडियाकर्मियों को भी दिया जाना चाहिए जो हर कच्चा चिठ्ठा जनता के सामने रखते आये... माना कि राखी सावंत थोड़ा ज्यादा दिखा दिया लेकिन ऐन वक्त पर हमने भी परिपक्वता दिखा दी...&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7953000159750832439-1008218438172946963?l=sinhasushant.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sinhasushant.blogspot.com/feeds/1008218438172946963/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://sinhasushant.blogspot.com/2009/05/blog-post_18.html#comment-form' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7953000159750832439/posts/default/1008218438172946963'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7953000159750832439/posts/default/1008218438172946963'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sinhasushant.blogspot.com/2009/05/blog-post_18.html' title='आखिरकार एक ऐसा चुनाव जो समझ से परे नहीं है.....'/><author><name>Sushant Sinha</name><uri>http://www.blogger.com/profile/15423665229773619092</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7953000159750832439.post-3136293417377336513</id><published>2009-05-11T19:28:00.001+05:30</published><updated>2009-05-11T19:28:44.343+05:30</updated><title type='text'>क्या मैं भी एक दिन इन जैसा हो जाऊंगा........???</title><content type='html'>नौ महीने के अंधकारवास के बाद&lt;br /&gt;मैं जब इस दुनिया में आया&lt;br /&gt;खुश होने की बजाए जाने क्यों&lt;br /&gt;बहुत रोया, और खूब चीखा चिल्लाया...&lt;br /&gt;उठना, रोना, खाना और सोना&lt;br /&gt;कुछ महीनों तक तो यही चला&lt;br /&gt;हर थोड़ी देर पर आंखे खोल दुनिया को घूरता था&lt;br /&gt;और अपनी निठ्ठली किस्मत पर रोता था&lt;br /&gt;शायद सदमा इतना था कि हर थोड़ी देर में नींद की बेहोशी में होता था...&lt;br /&gt;पल दो पल की देखी में हीं&lt;br /&gt;शायद समझ गया था मैं&lt;br /&gt;इस काली नगरी में मैं भी काला सन जाऊंगा&lt;br /&gt;और शायद एक दिन मैं भी इन जैसा हो जाऊंगा....&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुझसे ज्यादा चिंता मेरे रंग की थी&lt;br /&gt;गोरा, काला या फिर गहरा सांवला&lt;br /&gt;इसपर घंटों चिंता होती थी&lt;br /&gt;मेरे सिर पर बाल कम क्यों हैं&lt;br /&gt;इसका जवाब ढूंढने में लोगों ने अपने बाल नोच डाले&lt;br /&gt;आंख, नाक, मुंह, कान और पता नहीं कौन कौन से अंग&lt;br /&gt;किससे मिलते हैं&lt;br /&gt;इसके जवाब पर तो जिसे मौका मिलता था वही अपना हक जमा ले...&lt;br /&gt;मेरी हर छींक के सौ से ज्यादा कारण थे&lt;br /&gt;और उसका इलाज बताने वाले&lt;br /&gt;वो भी कहां साधारण थे...&lt;br /&gt;मेरा तो ये सब देख देख कर बुरा हाल था&lt;br /&gt;और मेरे डरे, सहमे पिद्दी से दिल में बस यही सवाल था&lt;br /&gt;कि मैं ये सब कब तक सह पाऊंगा&lt;br /&gt;और क्या एक दिन मैं भी इन जैसा हो जाऊंगा....???&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पर धीरे धीरे मैं भी एडजस्ट करने लगा&lt;br /&gt;इस दुनिया के अजीबो गरीब रंग में ढ़लने लगा&lt;br /&gt;लेकिन अब भी मेरे हर फैसले पर&lt;br /&gt;किसी न किसी का अमेरीका सा अधिकार मुझे कचोटता था&lt;br /&gt;और मैं यही सोचता था&lt;br /&gt;कि मेरा स्कूल तय करने से पहले ये मुझसे क्यों नहीं पूछते&lt;br /&gt;क्योंकि हर दिन उस स्कूल से 8 घंटे, ये तो नहीं जूझते...&lt;br /&gt;मुझे कौन सा खेल पसंद हो&lt;br /&gt;ये खेल खेल में तय हो जाता है&lt;br /&gt;मुझे हर वही चीज़ मन भाए&lt;br /&gt;जो परिवार के बजट में समाता है&lt;br /&gt;मेरी कोचिंग का नाम भी&lt;br /&gt;उस कोचिंग के पिछले बैच के बच्चों के मार्कस तय कर देते हैं&lt;br /&gt;और विद्रोह का बिगुल फूंको तो सबकुछ तुम्हारे लिए हीं तो किया&lt;br /&gt;ये पलट कर मुझसे कह देते हैं...&lt;br /&gt;मेरे जीवन पर ये सीनाजोरी कबतक चलेगी&lt;br /&gt;और कब तक मैं इस कैद में बंद रह पाऊंगा...&lt;br /&gt;पर उससे भी बड़ा सवाल है&lt;br /&gt;कि क्या एक दिन मैं भी इन जैसा हो जाऊंगा... ???&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;थोड़ा और बड़ा हुआ, कॉलेज पहुंचा&lt;br /&gt;यहां के तो ढंग हीं निराले थे&lt;br /&gt;सारे सिखिया पहलवान सुंदरीयों के जबरन बना दिए गए भाई&lt;br /&gt;और हर मुशटंडे के निस्वार्थ साले थे&lt;br /&gt;जिसको देखो, करियर...करियर चिल्लाता फिरता था&lt;br /&gt;और जो वो बनना चाहते थे उसका पढ़ाई से निपट नहीं कोई नाता था&lt;br /&gt;परिवार की झूठी आन, बान और शान के लिए&lt;br /&gt;जिन्दगी के सुनहरे दिन और कोरे कागज&lt;br /&gt;दोनों काले कर दिए&lt;br /&gt;हमारे जीवन के उठने, बैठने, जगने, सोने और नित्य क्रियाओं तक के&lt;br /&gt;सारे कार्यक्रम और समय प्रिंसीपल नाम के निगोड़े ने तय किए&lt;br /&gt;कॉलेज के गेट पर बैठा&lt;br /&gt;यही सोचता रहता था&lt;br /&gt;कब तक इनके बनाए रस्तों पर मैं आंखें भींचे चल पाऊंगा&lt;br /&gt;कहीं एक दिन मैं भी इन जैसा तो नहीं हो जाऊंगा....&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब तो नौकरी करता हूं&lt;br /&gt;दिनभर बॉस की हां में हां, कईयों को भरते देखता हूं&lt;br /&gt;जीवन कैसे जीना है, आगे कैसे बढ़ना है&lt;br /&gt;दूसरों के अलौकिक इतिहास की गाथाएं&lt;br /&gt;किसी तीसरे के मुंह से सुनकर पकता रहता हूं&lt;br /&gt;शादीशुदा मशीनों से भी मिलना हो जाता है&lt;br /&gt;जिन्हें कब बीवी, बच्चे, ससुराल या फिर बॉस के मोड में चलना है&lt;br /&gt;ये भी कोई और हीं बताता है&lt;br /&gt;एक जीवन मिला था, जो सबने किसी और के मुताबिक जीया&lt;br /&gt;कौन क्या सोचेगा, ये किया तो क्या होगा, हार गए तो....&lt;br /&gt;ये सब सोचने में हीं व्यर्थ कर दिया&lt;br /&gt;पर क्या मैं अपना जीवन अपनी मर्ज़ी से जी पाऊंगा&lt;br /&gt;या फिर एक दिन मैं भी इन जैसा हो जाऊंगा........&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7953000159750832439-3136293417377336513?l=sinhasushant.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sinhasushant.blogspot.com/feeds/3136293417377336513/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://sinhasushant.blogspot.com/2009/05/blog-post_11.html#comment-form' title='16 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7953000159750832439/posts/default/3136293417377336513'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7953000159750832439/posts/default/3136293417377336513'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sinhasushant.blogspot.com/2009/05/blog-post_11.html' title='क्या मैं भी एक दिन इन जैसा हो जाऊंगा........???'/><author><name>Sushant Sinha</name><uri>http://www.blogger.com/profile/15423665229773619092</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>16</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7953000159750832439.post-3782815020276262732</id><published>2009-05-05T01:38:00.005+05:30</published><updated>2009-06-02T11:15:36.999+05:30</updated><title type='text'>जीत की हवस नहीं, किसी पर कोई वश नहीं.......</title><content type='html'>आज दफ्तर में ऐसा कुछ हुआ जिससे इस बात में यकिन और बढ़ने लगा है कि लोगों में जीत की हवस और दूसरों पर हावी होने की भूख बढ़ती जा रही है.... और जब ऐसा नहीं हो पाता तो वो बहुत परेशान हो जाते हैं और कुछ ऐसे तरीके से बर्ताव करते हैं जिसे अगर बाद में, शांत मन से वो खुद कसौटी पर उतारें तो शर्मिंदा महसूस करें....&lt;br /&gt;दरअसल सच ये है कि हम सब इस दुनिया में एक अनुभव के लिए आए हैं.... हम जो हैं वो हम हैं और हम खुश हैं... वैसे हीं कोई दूसरा भी एक अलग पहचान, एक अलग व्यक्तित्व, एक अलग सोच के साथ इस दुनिया में आया है और वो वैसा हीं है और वो खुश है ... हमारा एक-दूसरे से अलग होना हीं हमारी पहचान है... हमारे बीच का अंतर हमें परेशान कर सकता है लेकिन तभी तक जब हम उस अंतर पर ध्यान दे रहे हैं... जिस दिन हम इस बात पर ध्यान देंगे कि वो क्या है जो हम चाहते हैं, जो हमें खुशी देता है... हमारा ध्यान खुद ब खुद उस अंतर पर से हट जाएगा जो हमें तकलीफ दे रहा था...&lt;br /&gt;हम इस दुनिया में इसलिए नहीं आए कि हर किसी को वही सच मानने पर मजबूर कर दें जो हमें लगता है कि सच है, या हर किसी को उसे हीं सही मानने के लिए बाध्य करें जो हमें लगता है कि सही है... या लोग उसे हीं खूबसूरत या बढ़िया माने जो हमें लगता है कि खूबसूरत या बढ़िया है.... नहीं... हम इसलिए नहीं आए हैं... हम सारी दुनिया को अपने जैसा बनाने नहीं आए हैं... क्योंकि जिस दिन ऐसा हो गया, हमारा आगे बढ़ना, इवौल्व होना, रुक जाएगा....&lt;br /&gt;लेकिन जाने-अनजाने हम सब कर यही रहे हैं... हम चाहते हैं कि सब वैसा हीं सोचें जैसा मैं सोचता हूं... सब वही करें जो मुझे लगता है कि सही है... मेरा सच उनके लिए सच हो... जो जो मैंने अपने जीवन में किया वो सबके लिए आदर्श हो और सब वैसा हीं करें... जबकि ऐसा नहीं है... हर कोई अपना जीवन जीने के लिए इस दुनिया में है... हम हमारे आसपास वैसी हीं दुनिया बनाते जाते हैं जैसी दुनिया हम चाहते हैं लेकिन दूसरे को ऐसा करने से रोकते हैं... हमारी दुनिया में हमारी मर्जी के बिना कोई नहीं आ सकता... कोई भी नहीं... लेकिन हम दूसरों की दुनिया में बिना इजाज़त घुसे चले जाते हैं... दरअसल हम दूसरों को, उनके जीवन को, उनकी भावनाओं को अपने मुताबिक कंट्रोल करना चाहते हैं... और यहीं से शुरुआत होती है सारी तकलीफों की.... हमें दूसरों पर कंट्रोल पाने की आदत से छुटकारा पाना होगा... इस आदत को बदलना होगा... और जैसे जैसे हम ऐसा करते जायेंगे हम खुद ब खुद उस मंज़िल की तरफ आसानी से बढ़ते जायेंगे जिसे हासिल करने के लिए हम इस दुनिया में आये हैं... हम सिर्फ खुद पर कंट्रोल रख सकते हैं... दूसरों पर कंट्रोल पाने की फितरत छोड़नी होगी... जैसे हम चाहते हैं कि हमें अपने मन मुताबिक जीवन जीने का मौका मिले, वैसा हीं मौका हमें दूसरों को भी देना होगा... वरना नुकसान सिर्फ सामने वाले का नहीं, खुद हमारा भी होगा...&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7953000159750832439-3782815020276262732?l=sinhasushant.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sinhasushant.blogspot.com/feeds/3782815020276262732/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://sinhasushant.blogspot.com/2009/05/blog-post_05.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7953000159750832439/posts/default/3782815020276262732'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7953000159750832439/posts/default/3782815020276262732'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sinhasushant.blogspot.com/2009/05/blog-post_05.html' title='जीत की हवस नहीं, किसी पर कोई वश नहीं.......'/><author><name>Sushant Sinha</name><uri>http://www.blogger.com/profile/15423665229773619092</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7953000159750832439.post-3456999143910748304</id><published>2009-05-03T01:11:00.001+05:30</published><updated>2009-05-04T00:38:33.472+05:30</updated><title type='text'>!!! ये शहर काति़ल है !!!</title><content type='html'>&lt;span class=""&gt;(बड़े शहर में आये कुछ हीं साल गुज़रे हैं.... लेकिन अमूमन जब भी दोस्तो से या खुद से बातें करता हूं तो अनायास हीं ये बात मुंह से निकल जाती है कि 'मुझे ये शहर पसंद नहीं...'&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;एक दिन शांत दिमाग से बैठकर सोचा कि जिस शहर ने इतना दिया वो मुझे पसंद क्यों नहीं....??? जवाब नीचे लिख रहा हूं....हालांकि ये बताना भी लाज़मी है कि लिखते वक्त बैकग्राउंड में 'ये दिल्ली है मेरे यार' गाना भी चल रहा है...)&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;एक लाश पड़ी है&lt;br /&gt;चारों तरफ भीड़ खड़ी है&lt;br /&gt;सब शांत हैं, हैरान हैं, परेशान हैं&lt;br /&gt;पर उनमें भी बाकि बची कहां जान है&lt;br /&gt;और वो लाश जिसपर सबकी नजर है&lt;br /&gt;वो मेरी है&lt;br /&gt;लेकिन कातिल कोई इंसान नहीं बल्कि ये ‘शहर’ है&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;छोटे शहर के बड़े सपने, और ये महानगर&lt;br /&gt;जाने कितनों को मार दिया जिन्दगी में घोल के जहर&lt;br /&gt;रिश्ते-नाते…... इनके बिना जिंदगी अधूरी थी&lt;br /&gt;यहां तो बिन काम किसी से मिलना मानो मजबूरी थी&lt;br /&gt;राम हूं... राम हूं... सीता मिलेगी&lt;br /&gt;इस बात का जाने कितना हल्ला मचाया&lt;br /&gt;पर यहां तो हर सीता को&lt;br /&gt;पांचाली बना पाया&lt;br /&gt;हर रोज़ की महाभारत ने मेरा राम भी मार दिया&lt;br /&gt;और चूं-चपड़ की तो Modern Culture का तीर धनुष तान दिया&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यहां मां Mom तो पिता Pop है&lt;br /&gt;बेटी बड़ी है, लेकिन बाप के सामने पहना डेढ़ बीत्ते का Top है&lt;br /&gt;सब दिख रहा है.....पर किसे ???&lt;br /&gt;इस सवाल का जवाब ढूंढे नहीं मिल रहा है&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पूरा शहर वृंदावन बना है&lt;br /&gt;हर प्रेमी जोड़ा कृष्ण और राधा है&lt;br /&gt;फिज़ा में प्यार तो है&lt;br /&gt;पर जो तब था और अब नहीं है वो मर्यादा है&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दुपहिये पर पीछे बैठने वाली हर लड़की Girl Friend है&lt;br /&gt;बहन को साथ घुमाना कहां आज का Trend है&lt;br /&gt;यहां सब प्रैक्टिकल हैं... कूल हैं.....&lt;br /&gt;और जो रिश्तों को दिल से लगाये&lt;br /&gt;वो यहां इमोशनल Fool हैं&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यहां Virgin होना शर्मनाक है&lt;br /&gt;हमारे यहां को तमगा यहां छुपाने की बात है&lt;br /&gt;बोलते हिंदी हैं&lt;br /&gt;पर जब करना कुछ गलत हो तो उसे अंग्रेजी में ढ़ालते हैं&lt;br /&gt;रेव पार्टी, वाइफ स्वैपिंग या Escort&lt;br /&gt;यहां किसी को नहीं सालते हैं&lt;br /&gt;मैं तो देख-देख हीं मर गया&lt;br /&gt;पर इनके लिए.. इनके लिए तो यही जिन्दगी है शायद…&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसी महानगर में 14 साल की एक बच्ची मरी&lt;br /&gt;साल की सबसे बड़ी मर्डर मिस्ट्री की खबर बनी&lt;br /&gt;बाप ने मारा.... नौकर ने मारा.....&lt;br /&gt;हत्यारा ढूंढने के लिए आज भी मचा है कहर&lt;br /&gt;लेकिन गौर से देखो&lt;br /&gt;उस जैसे कितनों को मारकर&lt;br /&gt;मुस्करा रहा है ये कातिल शहर...........&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7953000159750832439-3456999143910748304?l=sinhasushant.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sinhasushant.blogspot.com/feeds/3456999143910748304/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://sinhasushant.blogspot.com/2009/05/blog-post.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7953000159750832439/posts/default/3456999143910748304'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7953000159750832439/posts/default/3456999143910748304'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sinhasushant.blogspot.com/2009/05/blog-post.html' title='!!! ये शहर काति़ल है !!!'/><author><name>Sushant Sinha</name><uri>http://www.blogger.com/profile/15423665229773619092</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>0</thr:total></entry></feed>
